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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 123

इडया जुह्वतो वयं देवान् घृतवता यजे.
गृहान्लुभ्यतो वयं सं विशेमोप गोमतः.. (११)
हम गाय के घी से युक्त हवि के द्वारा यज्ञ करते हुए देवों को प्रसन्न करते हैं. उन देवों की
कृपा से हम सभी अभिलषित वस्तुओं एवं अनेक गायों से युक्त घरों को प्राप्त कर के उन में
सुख से निवास करें. (११)
एकाष्टका तपसा तप्यमाना जजान गर्भं महिमानमिन्द्रम्.
तेन देवा व्यसहन्त शत्रून् हन्ता दस्यूनामभवच्छचीपतिः.. (१२)
सब की स्वामिनी एकाष्टका ने तपस्या के द्वारा महिमा युक्त इंद्र को जन्म दिया. इंद्र की
सहायता से देवों ने शत्रुओं को पराजित किया. शची देवी के पति वह इंद्र, दस्यु जनों के
विनाशक हुए. (१२)
इन्द्रपुत्रे सोमपुत्रे दुहितासि प्रजापतेः.
कामानस्माकं पूरय प्रति गृह्णाहि नो हविः.. (१३)
हे इंद्र और सोम की माता एकाष्टका! तू प्रजापति की पुत्री है. तू हमारे द्वारा दी हुई हवि
को स्वीकार करती हुई हमें सतान तथा पशुओं से संपन्न बना. (१३)
सूक्त-११ देवता—इंद्र, अग्नि आदि
मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्.
ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्.. (१)
हे व्याधिग्रस्त मनुष्य! मैं हवि के अन्न द्वारा तुझे उस यक्ष्मा रोग से मुक्त करता हूं जो मेरे
जाने बिना ही तेरे शरीर में प्रवेश कर गया है. राजा सोम को जिस राजयक्ष्मा ने गृहीत किया
था, दीर्घ जीवन के लिए उस से भी मैं तुझे मुक्त करता हूं. हे इंद्र और अग्नि! जिस पिशाचिनी
ने इस बालक को पकड़ लिया है, आप दोनों उस से इस बालक को छुड़ाइए. (१)
यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव.
तमा हरामि निर्ऋतेरुपस्थादस्पार्शमेनं शतशारदाय.. (२)
यह व्याधिग्रस्त मनुष्य चाहे क्षीण आयु वाला हो गया हो अथवा इस लोक को छोड़ कर
मृत्यु के देव यमराज के समीप चला गया हो अर्थात् चाहे उस की चिकित्सा असंभव हो-इस
प्रकार के पुरुष को भी मैं मृत्यु के पास से वापस ला कर सौ वर्ष जीवित रहने के लिए
शक्तिशाली बनाता हूं. (२)
सहस्राक्षेण शतवीर्येण शतायुषा हविषाहार्षमेनम्.
इन्द्रो यथैनं शरदो नयात्यति विश्वस्य दुरितस्य पारम्.. (३)
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