अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूक्त-५ देवता—सोम
आयमगन् पर्णमणिर्बली बलेन प्रमृणन्त्सपत्नान्.
ओजो देवानां पय ओषधीनां वर्चसा मा जिन्वत्वप्रयावन्.. (१)
अपनी शक्ति की अधिकता से शत्रुओं को नष्ट करने वाली तथा सभी ओषधियों की सार
रूप तथा श्रेष्ठ फल देने वाली यह पर्णमणि मुझे प्राप्त हो. हे देवो! ओज रूप यह पर्णमणि
मुझे अपने तेज से तेजस्वी बनाए. (१)
मयि क्षत्रं पर्णमणे मयि धारयताद् रयिम्.
अहं राष्ट्स्याभीवर्गे निजो भूयासमुत्तमः.. (२)
हे पलाश से निर्मित पर्णमणि! मुझ मणि धारण कर्ता को बल एवं धन प्रदान करो. तुम्हें
धारण करने के कारण मैं अपने राज्य को स्वाधीन करने में किसी की सहायता न लेने से
सर्वोत्तम बनूं. (२)
यं निदधुर्वंनस्पतौ गुह्यं देवाः प्रियं मणिम्.
तमस्मभ्यं सहायुषा देवा ददतु भर्तवे.. (३)
इंद्र आदि देवों ने मनचाहा फल देने के कारण प्रिय इस मणि को पलाश वृक्ष में गोपनीय
रूप से छिपा कर रखा था. देवगण मेरी आयु वृद्धि करें और भरणपोषण के निमित्त मुझे वह
पर्णमणि प्रदान करें. (३)
सोमस्य पर्णः सह उग्रमागन्निन्द्रेण दत्तो वरुणेन शिष्टः.
तं प्रियासं बहु रोचमानो दीर्घायुत्वाय शतशारदाय.. (४)
दूसरों को पराजित करने की शक्ति देने वाली सोम मणि मुझे प्राप्त हो. इंद्र द्वारा दी हुई
और वरुण द्वारा अनुमत उस प्रिय मणि को मैं सौ वर्ष की दीर्घ आयु पाने के लिए धारण
करूं. (४)
आ मारुक्षत् पर्णमणिर्मह्या अरिष्टतातये.
यथाहमुत्तरो ऽ सान्यर्यम्ण उत संविदः.. (५)
यह पर्णमणि मेरा कल्याण करने के लिए मुझे चिरकाल तक प्राप्त हो. यह मणि धारण
कर के मैं अर्यमा की कृपा से शत्रु नाश में समर्थ, अधिक बली एवं उत्तम बन जाऊं. (५)
ये धीवानो रथकाराः कर्म्मारा ये मनीषिणः.
उपस्तीन् पर्ण मह्यं त्वं सर्वान् कृण्वभितो जनान्.. (६)
हे पर्णमणि! तुम सभी मछली पकड़ने वाले, रथकार अर्थात् बढ़ई, लुहार और
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