अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextअमीषां चित्तानि प्रतिमोहयन्ती गृहाणाङ्गान्वप्वे परेहि.
अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकैर्रग्राह्यामित्रंस्तमसा विध्य शत्रून्.. (५)
हे सुखों और प्राणों को नष्ट करने वाली अप्वा नाम की पापदेवी! तुम हमारे शत्रुओं के
हृदयों को भ्रमित करती हुई उन के शरीरों में व्याप्त हो जाओ. तुम हम से मुंह मोड़ कर हमारे
शत्रुओं की ओर जाओ और रोग, भय आदि से उत्पन्न शोकों से उन के हृदयों को संतप्त करो.
तुम अज्ञान रूप पिशाची के सहयोग से हमारा अहित चाहने वाले शत्रुओं को मार डालो. (५)
असौ या सेना मरुतः परेषामस्मानैत्यभ्योजसा स्पर्धमाना.
तां विध्यत तमसापव्रतेन यथैषामन्यो अन्यं न जानात्.. (६)
हे मरुतो! शत्रुओं की यह सेना अपने बल की अधिकता के कारण हमारे साथ संघर्ष
करती हुई हमारी ओर आ रही है. इसे अपने द्वारा प्रेरित माया से कर्तव्यज्ञान शून्य बना करके
नष्ट कर दो. इन शत्रुओं को ऐसा बना दो कि इन में से कोई भी एक दूसरे को न पहचान सके.
(६)
सूक्त-३ देवता—अग्नि
अचिक्रदत् स्वपा इह भुवदग्ने व्यचस्व रोदसी उरूची.
युञ्जन्तु त्वा मरुतो विश्ववेदस आमुं नय नमसा रातहव्यम्.. (१)
हे अग्नि! अपने राज्य से च्युत हुआ यह राजा पुनः राज्य पाने के लिए तुम्हारी प्रार्थना
कर रहा है. तुम्हारी कृपा से यह अपने राज्य में प्रजाओं का पालक बने. हे व्यापनशील
अग्नि! इस के निमित्त तुम धरती और आकाश में व्याप्त हो जाओ. विश्वे देव और उनचास
मरुत् तुम्हारी सहायता करें. तुम्हें नमस्कार करने वाले एवं हवि देने वाले इस राजा को इस का
राज्य पुनः प्राप्त कराओ. (१)
दूरे चित् सन्तमरुषास इन्द्रमा च्यावयन्तु सख्याय विप्रम्.
यद् गायेत्रीं बृहतीमर्कमस्मै सौत्रामण्या दधृषन्त देवाः.. (२)
हे ऋत्विजो! आप लोग स्वर्ग में निवास करने वाले मेधावी इंद्र को राजा की सहायता
करने हेतु बुलाएं. देवों ने गायत्री और बृहती छंदों तथा इंद्र संबंधी सौत्रामणी यज्ञ के द्वारा इंद्र
को अतिशय शक्तिशाली बना दिया है. (२)
अद्भ्यस्त्वा राजा वरुणो ह्वयतु सोमस्त्वा ह्वयतु पर्वतेभ्यः.
इन्द्रस्त्वा ह्वयतु विड्भ्य आभ्यः श्येनो भूत्वा विश आ पतेमाः.. (३)
हे राजन्! आप का राज्य शत्रुओं ने छीन लिया है. आप को आप के राज्य पर स्थापित
करने के लिए वरुण अपने से संबंधित जल से, सोम अपने आश्रय स्थान पर्वतों से तथा इंद्र
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