अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 111 of 1063
Read in contextसहयोग से भस्म करने हेतु विकराल बनी हुई अपनी गति से शत्रु सेना को युद्ध से मुंह मोड़
कर भागने पर विवश कर के नष्ट कर दो. (५)
इन्द्रः सेनां मोहयतु मरुतो घ्नन्त्वोजसा.
चक्षूंष्यग्निरा दत्तां पुनरेतु पराजिता.. (६)
देवों के अधिपति इंद्र शत्रु सेना को किंकर्तव्यविमूढ़ कर दें और मरुत् अपने तेज से उस
का विनाश करें. अग्नि देव उन की आंखों से देखने की शक्ति छीन लें. इस प्रकार पराजित
शत्रु सेना वापस चली जाए. (६)
सूक्त-२ देवता—अग्नि, इंद्र आदि
अग्निर्नो दूतः प्रत्येतु विद्वान् प्रतिदहन्नभिशस्तिमरातिम्.
स चित्तानि मोहयतु परेषां निर्हस्तांश्च कृणवज्जातवेदाः.. (१)
सब कुछ जानने वाले और देवदूत अग्नि हमारे शत्रुओं को जला डालें और सामने की
ओर से आते हुए हिंसक शत्रुओं के मन को किंकर्तव्यविमूढ़ कर दें. जातवेद अग्नि उन्हें इस
योग्य न रखें कि वे हाथ से शस्त्र उठा सकें. (१)
अयमग्निरमूमुहद् यानि चित्तानि वो हृदि.
वि वो धमत्वोकसः प्र वो धमतु सर्वतः.. (२)
हे शत्रुओ! तुम्हारे हृदयों में जो हम पर आक्रमण करने संबंधी विचार हैं, उन्हें समाप्त
करते हुए अग्नि देव तुम्हारे हृदयों को मोहित करें. वे तुम्हें तुम्हारे निवास से पूरी तरह निकाल
दें एवं तुम्हारे स्थानों को नष्ट कर दें. (२)
इन्द्र चित्तानि मोहयन्नर्वाङाकूत्या चर.
अग्नेर्वातस्य भ्राज्या तान् विषूचो वि नाशय.. (३)
हे इंद्र! तुम हमारे शत्रुओं के हृदयों को भ्रमित करते हुए एवं अपने मन में उन्हें नष्ट करने
का संकल्प लिए हुए शत्रुसैन्य के सामने जाओ. तुम अग्नि और वायु के सहयोग से भस्म
करने हेतु विकराल बनी हुई अपनी गति से शत्रु सेना को युद्ध से मुंह मोड़ कर भागने पर
विवश कर के नष्ट कर दो. (३)
व्याकृतय एषामिताथो चित्तानि मुह्यत.
अथो यदद्यैषां हृदि तदेषां परि निर्जहि.. (४)
हे विरुद्ध संकल्पो! तुम शत्रुओं के हृदयों में जाओ. हे शत्रुओं के हृदयो! तुम भ्रमित हो
जाओ. युद्ध करने के लिए उद्यत हमारे शत्रुओं के हृदयों में जो कार्य करने की इच्छा है, उसे
पूर्ण रूप से नष्ट कर दो. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*