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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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हम ने भोजन करते हुए पृथ्वी में धनों को गाड़ दिया है. पवित्र स्थानों में अग्नियों को
जानते हुए विश्वकर्मा हमारे यज्ञ को सफल बनाएं. जो लोग हवन नहीं करते हैं अथवा दोष
पूर्ण यज्ञ करते हैं, वे मेरे यज्ञ की सफलता देख कर शोक करें. (१)
यज्ञपतिमुषय एनसाहुर्निर्भक्तं प्रजा अनुतप्यमानम्.
मथव्यान्स्तोकानप यान् रराध सं नष्टेभिः सृजतु विश्वकर्मा.. (२)
ऋषियों ने ऐसे यजमान को पाप युक्त बताया है, जो दुर्गति वाला हो तथा जिस की
प्रजाएं उस के साथसाथ दुःखी हों. उस यजमान ने सोमरस की बूंदों को चुरा कर जो अपराध
किया है, विश्वकर्मा सोमरस की उन बूंदों से हमारे यजमान को मिलाएं. (२)
अदान्यान्सोमपान् मन्यमानो यज्ञस्य विद्वान्समये न धीरः.
यदेनश्चकृवान् बद्ध एष तं विश्वकर्मन् प्र मुञ्चा स्वस्तये.. (३)
यज्ञ का स्वरूप जानने के गर्व से मोहित तथा अपने अतिरिक्त सोम पीने वाले पंडितों
को भी अज्ञानी समझने वाला उसी प्रकार पाप करता है, जिस प्रकार संग्राम में अपने को
महाबली समझने वाला और शत्रु योद्धाओं का तिरस्कार करने वाला बंदी बन कर कष्ट उठाता
है. हे विश्वकर्मा! उस पापी को कल्याण प्राप्ति के लिए पाप से छुड़ाओ. (३)
घोरा ऋषयो नमो अस्त्वेभ्यश्चक्षुर्यदेषां मनसश्च सत्यम्.
बृहस्पतये महिष द्युमन्नमो विश्वकर्मन् नमस्ते पाह्य १ स्मान्.. (४)
जो क्रूर ऋषि अर्थात् प्राण, चक्षु आदि हैं, उन के लिए नमस्कार है. इन प्राणों और
अंतःकरण के मध्य में जो यथार्थदर्शी नेत्र हैं, उन के लिए भी नमस्कार है. बृहस्पति देव के
लिए भी इसी प्रकार का दीप्तिशाली एवं महत्त्वपूर्ण नमस्कार है. हे विश्वकर्मा, आप को
नमस्कार है, आप हमारी रक्षा करें. (४)
यज्ञस्य चक्षुः प्रभृतिर्मुखं च वाचा श्रोत्रेण मनसा जुहोमि.
इमं यज्ञं विततं विश्वकर्मणा देवा यन्तु सुमनस्यमानाः.. (५)
यज्ञ के नेत्र, यज्ञ के आदि रूप एवं मुख रूप अग्नि के प्रति मैं वाणी, कान तथा मन के
द्वारा हवन करता हूं. विश्वकर्मा के द्वारा विस्तृत इस यज्ञ में समस्त देव एकमत हो कर आएं.
(५)
सूक्त-३६ देवता—अग्नि आदि
आ नो अग्ने सुमतिं संभलो गमेदिमां कुमारीं सह नो भगेन.
जुष्टा वरेषु समनेषु वल्गुरोषं पत्या सौभगमस्त्वस्यै.. (१)
हे अग्नि देव! हमारी मान्यता के अनुसार, सर्व लक्षणों से युक्त एवं कन्या चाहने वाला