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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 106 of 1063

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Page 106

निष्क्रीतः स यज्ञियं भागमेतु रायस्पोषा यजमानं सचन्ताम्.. (१)
जो पशुपति रुद्र चार पैरों वाले पशुओं और दो पैरों वाले मनुष्यों के स्वामी हैं, उन के
पास से प्राप्त किया हुआ यह यज्ञ के योग्य पशु यज्ञ का भाग बने एवं यजमान को धन की
समृद्धियां प्राप्त हों. (१)
प्रमुञ्चन्तो भुवनस्य रेतो गातुं धत्त यजमानाय देवा:.
उपाकृतं शशमानं यदस्थात् प्रियं देवानामप्येतु पाथः.. (२)
हे देवो! इस मारे जाते हुए पशु को त्याग कर जाते हुए चक्षु, प्राण आदि इसे यजमान के
लिए वीर्य के द्वारा पुण्य लोकों में जाने का मार्ग बनाएं. इस पशु में देवों का प्रिय जो मांस है,
वह भी इसे प्राप्त हो. (२)
ये बध्यमानमनु दीध्याना अन्वैक्षन्त मनसा चक्षुषा च.
अग्निष्टानग्रे प्र मुमोक्तु देवो विश्वकर्मा प्रजया संराणः.. (३)
इस यज्ञीय पशु के समूह के जो पशु इसे मारा जाता हुआ देख कर दुखी होते हैं और
दुखी मन से इसे प्रेम भरे नेत्रों द्वारा देखते हैं, अग्नि देव उन सब के लिए प्रेम का फंदा खोल
दें. अपनी सृष्टि के साथ शब्द करते हुए विश्वकर्मा भी इसे मुक्त करें. (३)
ये ग्राम्याः पशवो विश्वरूपा विरूपाः सन्तो बहु धैकरूपाः.
वायुष्टानग्रे प्र मुमोक्तु देवः प्रजापतिः प्रजया संराणः.. (४)
जो ग्रामीण पशु सभी रूपों से युक्त एवं विविध रूप वाले हो कर भी प्रायः एक रूप
वाले हैं, उन सब को वायु देव सब से पहले मुक्त करें. अपनी प्रजा के साथ एकमत होते हुए
प्रजापति भी बाद में इस पशु को मुक्त कराएं. (४)
प्रजानन्तः प्रति गृह्णन्तु पूर्वे प्राणमङ्गेभ्यः पर्याचरन्तम्.
दिवं गच्छ प्रति तिष्ठा शरीरैः स्वर्गं याहि पथिभिर्देवयानैः.. (५)
हे पशु! इस यज्ञ में तेरे माहात्म्य को जानते हुए अंतरिक्ष में स्थित देव तेरे अंगों की सेवा
करते हुए सभी ओर से निकल कर सामने आते हुए तेरे प्राणों को ग्रहण करें. इस के पश्चात
तुम देवों के द्वारा गृहीत हो कर स्वर्ग में जाओ तथा वहां दिव्य भोगों के प्रति स्थित बनो. इस
यज्ञ के बाद तुम देवों के मार्ग से स्वर्ग में जाओ. (५)
सूक्त-३५ देवता—विश्वकर्मा
ये भक्षयन्तो न वसून्यानृधुर्यान्नग्नयो अन्वतप्यन्त धिष्ण्याः.
या तेषामवया दुरिष्टिः स्विष्टिं नस्तां कृणवद् विश्वकर्मा.. (१)
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