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अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

Page 383 of 405

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Page 383

उन्नीसवाँ प्रकरण।

—:०:—

मूलम्।

तत्त्वविज्ञानसंदंशमादाय हृदयोदरात्।
नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः कृतो मया ॥ १ ॥

पदच्छेदः।

तत्त्वविज्ञानसंदंशम्, आदाय, हृदयोदरात्, नानाविध-परामर्शशल्योद्धारः, कृतः, मया ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
भवतः= आपसेनानाविधपरामर्शशल्योद्धारः= नाना प्रकार के विचार-रूपबाण का उद्धार
तत्त्वविज्ञानसंदंशम्= तत्त्वज्ञानरूप संसी कोमया= मुझ करके
आदाय= ले करकेकृतः= किया गया है ॥
हृदयोदरात्= हृदय और उदर से

भावार्थ।

अब एकोनविंशति प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं—
शिष्य गुरु के मुख से तत्त्व-ज्ञानी की स्वाभाविक शान्ति को श्रवण करके, अपने को कृतार्थ मानकर, अब गुरु के तोष के लिये अपनी शान्ति को आठ श्लोकों द्वारा कहता है।
हे गुरो! मैंने आपके सकाश से तत्त्वज्ञान के उपदेश की संसीरूपी शास्त्र द्वारा अपने हृदय से नाना प्रकार के संकल्पों और विकल्पों को निकाल दिया है ॥ १ ॥