अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished405 pages
Page 367 of 405
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३६० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| यत्र = जहाँ | चरतः = फिरनेवाले |
| अस्तमितशायिनः = सूर्य अस्त होता है, वहाँ ही शयन करनेवाले | धीरस्य = ज्ञानी को |
| यथापतितवर्तिनः = पतितवर्त्ती के समान | |
| च = और | सर्वत्र = सर्वत्र |
| स्वच्छन्दम् = इच्छानुसार | तुष्टिः = आनन्द |
| देशान् = देशों में | भवति = होता है ॥ |
भावार्थ ।
धीर विद्वान् को जैसे-जैसे प्रारब्धवश से पदार्थ की प्राप्ति होती है, वैसे ही वैसे वह संतुष्ट रहता है, और प्रारब्ध के वश से नाना प्रकार के देशों में, वनों में, नगरों में विचरता हुआ सर्वत्र ही तुष्ट रहता है ॥ ८५ ॥
मूलम् ।
पततूदेतु वा देहो नास्य चिन्ता महात्मनः ।
स्वभावभूमिविश्रान्तिविस्मृताशेषसंसृतेः ॥ ८६ ॥
पदच्छेदः ।
पततु, उदेतु, वा, देहः, न, अस्य, चिन्ता, महात्मनः, स्वभाव भूमि विश्रान्तिविस्मृताशेषसंसृतेः ॥