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अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

Page 296 of 405

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Page 296

अठारहवाँ प्रकरण । २८९

अन्वयः = शब्दार्थःअन्वयः = शब्दार्थः
क्व=कहाँवा=और
तत्=वहक्व=कहाँ
ध्यानम्=ध्यान हैमुक्ता=मुक्ति है ॥

भावार्थ ।
जीवन्मुक्त के सब संकल्प नष्ट हो जाते हैं, इसी से उसको मोह भी किसी पदार्थ में नहीं रहता है, इसी से उसकी दृष्टि में जगत् भी नहीं प्रतीत होता है, और न वह ध्यान की तथा मुक्ति की इच्छा करता है । क्योंकि उसके मन की फुरना कोई भी बाकी नहीं रहती है ॥ १४ ॥

मूलम् ।
येन विश्वमिदं दृष्टं स नास्तीति करोतु वै ।
निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति ॥ १५ ॥

पदच्छेदः ।
येन, विश्वम्, इदम्, दृष्टम्, सः, न, अस्ति, इति, करोतु, वै, निर्वासनः, किम्, कुरुते, पश्यन्, अपि, न, पश्यति ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
येन=जिस पुरुष करकेअस्ति=है
इदम्=यहवै=निश्चय करके
विश्वम्=विश्व घट, पट आदिनिर्वासनः=वासना-रहित पुरुष
दृष्टम्=देखा गया हैकिं कुरुते=क्या करता है अर्थात् कुछ भी नहीं करता है
सः=वहसः=वह
इति=ऐसापश्यन्=देखता हुआ
करोतु=जाने किअपि=भी
तत्=वह अर्थात् विश्वन पश्यति=नहीं देखता है ॥
न=नहीं