Skip to content
SarvaKosh
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

Page 233 of 405

Read in context
Page 233

२२६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

होता है, यह नियम है। देह द्रव्य है, तुम द्रष्टा हो। देह के साथ तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं है। चाहे यह तुम्हारा स्थूल देह कल्प पर्यंत स्थिर रहे, चाहे अभी गिर जाय। देह के स्थिर रहने से तुम्हारी स्थिति नहीं है और देह के गिर जाने से तुम्हारा नाश नहीं है। देह की वृद्धि से तुम्हारी वृद्धि नहीं, क्योंकि देह से तुम परे हो। देह मिथ्या है, तुम सत्य हो। देह को भी तुम सत्ता स्फूर्ति देनेवाले हो। देह के भी तुम साक्षी हो, ऐसा निश्चय करके तुम जीवन्मुक्त होकर विचरो ॥ १० ॥

मूलम् ।

त्वय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः ।
उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिनर्वा क्षतिः ॥ ११ ॥

पदच्छेदः ।

त्वयि, अनन्तमहाम्भोधौ, विश्ववीचिः, स्वभावतः, उदेतु, वा, अस्तम्, आयातु, न, ते, वृद्धिः, न, वा, क्षतिः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अनन्तमहाम्भोधौ=अपार महा- समुद्र विषेअस्तम्=अस्त को
आयातु=प्राप्त होते हैं
विश्ववीचिः=विश्व-रूप तरंगपरन्तु=परन्तु
स्वभावतः=स्वभाव सेते=तेरी
उदेतु=उदय होते हैं ।वृद्धिः न=न वृद्धि है
या=औरवा=और
न क्षतिः=न नाश है ॥