अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished405 pages
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२१० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
नहीं फुरती है, और बाहर से जो उन्मत्त की तरह स्वेच्छा-
पूर्वक विहार करता है, वही ज्ञानी है । उसको ज्ञानी पुरुष
ही जानता है, दूसरा अज्ञानी पुरुष नहीं जान सकता
है ॥ ४ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां चतुर्दशप्रकरणं समाप्तम् ॥
—:०:—