अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished405 pages
Page 180 of 405
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ग्यारहवाँ प्रकरण । १७३
वाला कहा जाता है । संसार में सब जीवों को आपदाएँ
और सम्पदाएँ प्रारब्धकर्मों के अनुसार ही प्राप्त होती हैं,
ऐसे निश्चय करनेवाला जो पुरुष है, और भोगों की तृष्णा
से जो रहित है, और जिसके इन्द्रियादिक वश में हैं, और
किसी पदार्थ में जिसकी इच्छा नहीं है, अर्थात् जो अप्राप्त
वस्तु की प्राप्ति की इच्छा नहीं करता है, और जो प्राप्त
वस्तु के नष्ट होने से शोक नहीं करता, वही नित्य सुख को
प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
मूलम् ।
सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी ।
साध्यादर्शी निरायासःकुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ४ ॥
पदच्छेदः ।
सुखदुःखे, जन्ममृत्यू, दैवात्, इति, निश्चयी, साध्यादर्शी,
निरायासः, कुर्वन्, अपि, न, लिप्यते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सुखदुःखे= | सुख और दुख | च= | और |
| जन्ममृत्यू= | जन्म और मरण | निरायासः= | श्रम-रहित |
| दैवात् एव= | दैव से ही होता है | कुर्वन्= | कर्म को करता हुआ |
| इति= | ऐसा | न लिप्यते= | नहीं लिप्त होता है ॥ |
| निश्चयी= | निश्चय करनेवाला | ||
| साध्यादर्शी= | साध्य कर्म को देखनेवाला |