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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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शब्द के प्रेमी

कोई बूझाई जन जौहरी, जो शब्द की पारख करै ।
चितलाय सुनहिं सिखावनो, हितलाय के हिरदय धरै ॥
तम मोह मो सम ज्ञान रवि, जब प्रगट हो तब सूझई ।
कहत हौं मैं शब्द साँचा, संत कोई बूझई ॥

कोई जौहरी ही सत्य शब्द रूपी सोने की पारख कर सकता है ।
साहिब कह रहे हैं कि जो समझा रहा हूँ, ध्यान से समझो और हितकारी
जानकर हृदय में बिठा लो । मेरे समान ज्ञान का सूर्य जब प्रगट होता है,
तभी अज्ञान का अंधेरा समझ पड़ता है । सत्य शब्द कहता हूँ, जिसे कोई
संत ही समझ सकता है ।

कोई इक संत सुजान, जो मम सब्द बिचारई ।

पावै पद निर्वाण, बसत अनुराग जासु उर ॥

जिसके हृदय में प्रेम होगा, वो ही निर्वाण पद को प्राप्त करेगा, जो
मेरे इन शब्दों पर विचार करे, ऐसा कोई समझदार संत ही होगा ।

धर्मदास पूछते हैं

हे सतगुरु बिनवौं कर जोरी । संशय प्रभु इक मेटो मोरी ॥

जाके चित अनुराग समाना । ताको कहो कवन सहिदाना ॥

अनुरागी कैसे लखि परई । बिन अनुराग जीव नहिं तरई ॥

सो अनुराग प्रभु मोहि बताओ । देइ दृष्ट्यांत भले समझाओ ॥

धर्मदास जी हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कह रहे हैं कि कृपा
करके मेरा एक संशय मिटा दो; यदि प्रेम के बिना जीव नहीं तर सकता
तो मुझे यह बता दो कि जो सच्चा प्रेमी होता है, उसकी पहचान क्या है !

साहिब कहते हैं

धर्मदास परखहु चित लाई । अनुरागी लछन सुखदाई ॥

जैसे मृगा नाद सुनि धावै । मगन होय व्याध ठिग आवै ॥

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