अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
Page 57 of 144
Read in contextब्रह्मा को लाने चली गायत्री
उबटि शरीर मैल गहि काढ़ी। पुत्री रूप कीन्ह रचि ठाढ़ी ॥
शक्ति अंश निज ताहि मिलावा। नाम गायत्री ताहि धरावा ॥
गायत्री मातहि सिर नावा। चरण चूम निज सीस चढ़ावा ॥
तब शक्ति ने शरीर से मैल निकालकर गायत्री नामक कन्या की उत्पत्ति की, उसमें अपना अंश मिलाया। गायत्री ने माता के चरणों में शीश नमाकर उसके चरणों को चूमा।
गायत्री ने पूछा
गायत्री विनवै कर जोरी। सुनु जननी इक विनती मोरी ॥
कौन काज मो कहँ निरमाई। कहो बचन लेउँ सीस चढ़ाई ॥
गायत्री ने माता से पूछा कि उसकी उत्पत्ति क्यों की गयी है !
कहे अद्या पुत्री सुनु बाता। ब्रह्मा आहि जेठहि तुव भ्राता ॥
पिता दरश कहँ गयो अकाशा। आनौ ताहि वचन परगासा ॥
दरश तात कर वह नहिं पावे। खोजत खोजत जनम गमावे ॥
जौने विधि ते इहँवा आई। करो जाय तुम तौन उपाई ॥
आद्य शक्ति ने कहा—हे पुत्री ! तम्हारा बड़ा भाई ब्रह्मा पिता का दर्शन करने आकाश को गया है, वो पिता का दर्शन नहीं पा सकेगा और खोजते -2 जन्म गँवा रहा है, इसलिए तुम जाओ और ऐसा उपाय करो जिससे वो यहाँ वापिस आ जाए।
चलि गायत्री मारग आई। जननी वचन प्रीति चित लाई ॥
चलत भई मारग सुकुमारी। जननी वचन ध्यान उर धारी ॥
गायत्री माता के वचनों को ध्यान से सुन हृदय में धारण कर चल पड़ी।
57