अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
Devanagarihipublished144 pages
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साहिब बन्दगी
व्यतीत हो गया, पर ब्रह्मा को पिता के दर्शन नहीं हुए। चार युग उसने ध्यान में गँवा दिये, पर दर्शन नहीं पा सका।
ब्रह्मा तात दरश नहीं पाया। शून्य ध्यान महँ बहु जाया ॥
माता चिन्ता करत मन माहाँ। जेठ पुत्र ब्रह्मा रहु काहाँ ॥
किहि विधि रचना रचहु बनाई। ब्रह्मा आवे कौन उपाई ॥
इधर शून्य में ध्यान मग्न ब्रह्मा को युग बीत गये, पर पिता का दर्शन न हुआ और उधर शक्ति को चिंता हुई कि उसका बड़ा बेटा कहाँ रह गया, क्योंकि सृष्टि की रचना जो करनी थी, सो उसने सोचा कि ब्रह्मा को कैसे बुलाया जाए!
सार शब्द सर्व से न्यारा, भेद न पावे कोई।
चार वेद में ब्रह्मा भूलें, आदि नाम न पाई॥