Skip to content
SarvaKosh
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

Page 14 of 144

Read in context
Page 14

14

साहिब बन्दगी

भूंग मत दूढ़ कै गहे तो, करौ निज सम तोहिं हो ।
दुतिया भाव न चित व्यापे, सो लहै जिव मोहिं हो ॥
गुरु शब्द निश्चय सत्य माने, भूंग गति तब पावई ।
तजि सकल आसा शब्द वासा, कागा हंस कहावई ॥

साहिब कह रहे हैं कि यदि भूंगे वाली बात को विचार कर मेरे शब्द को दूढ़ता से पकड़े रहो तो तुम्हें अपने समान कर दूँ। जो जीव मेरे शब्द के अलावा किसी दूसरे भाव को चित में नहीं लाता, वो मुझे पा जाता है। जब जीव गुरु के शब्द पर विश्वास करके उसे सत्य मानता है, तभी भूंगे वाली बात हो पाती है। जो अन्य सबकी आशा छोड़कर केवल शब्द में रमे रहता है, वो कोवे से हंस हो जाता है।

धर्मन सुन तुम मृतक सुभावा । मृतक होय सतगुरु पद पावा ॥
मृतक छोह निभाव उर धारे । छोह निभावहि जीव उबारे ॥

साहिब कह रहे हैं कि जीवित मृतक समान होने वाला कोई बिरला जीव होता है; वो गुरुपद को प्राप्त करता है। जो हृदय में प्रेम बसाए रखता है और उसे अच्छी तरह निभाता है, वो ही संसार सागर से खुद तरकर दूसरों को भी तारता है।

जस पृथ्वी कै गंजन होई । चित अनुराग गहो गुण सोई ॥
कोई चंदन कोई विष्ठा डारे । कोई कोड़ि कृशी अनुसारै ॥
गुण अवगुण तिन्ह सम कर जाना । महा विरोध अधिक सुख माना ॥

जैसे पृथ्वी की दुर्दशा होती है, उसका तिरस्कार होता है और वो सब कुछ समान भाव से सहती है, ऐसे ही तुम भी सहो। कोई उस पर चन्दन फेंकता है तो कोई विष्ठा और कोई-कोई कौड़ी फेंकता है, पर पृथ्वी तो सबके गुण-अवगुणों को समान भाव से ग्रहण करती है, मान-अपमान को सम-भाव से ग्रहण करती है और किसी का विरोध नहीं करती हुई सुख से रहती है।