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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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अनुरागसागर वाणी

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मृतक होय के खोजहु संता। शब्द बिचार गहैं मग अंता॥
जैसे भुंग कीट के पास। कीटहि गहि सुरु गमि परकासा॥
पंखधात कर महिं तिहि डारे। भुंगी शब्द कीट जो धारे॥
तब लैगो भुंगी निज गेहा। स्वाँस देइ कीन्हे निज देहा॥
भुंगी शब्द कीट जो माना। वरण फेर आपन कर जाना॥
बिरला कीट होय सुखदाई। प्रथम अवाजु गहै चित लाई॥
कोई दूजे कोई तीजे मानै। तनमन रहित शब्द हित मानै॥
भुंगी शब्द कीट ना गहई। तो पुनि कीट असारे रहई॥
धर्मदास यह कीट को भेवा। यहि मति शिष्य गहे गुरुदेवा॥

साहिब कह रहे हैं-हे धर्मदास! यह बड़ी ही कठिन कहानी है, गुरु कृपा से, गुरुप्रेम से किन्हीं विरले जनों ने इस रहस्य को जाना है; बिचारकर उन्होंने शब्द के सहारे भीतरी मार्ग को पकड़ा है और जीते -जी मृतक समान होकर उस सत्य की खोज की है। जैसे भुंगा कीड़े को पकड़कर अपना शब्द सुनाता है और यदि वो कीड़ा उसका शब्द सुन लेता है तो वो भी उसी की तरह हो जाता है, उसमें पंख भी आ जाते हैं। कीड़े में उड़ने की क्षमता नहीं है, पर फिर उसमें बहुत तेज उसी की तरह उड़ने की क्षमता आ जाती है। इस तरह भुंगा उसे अपने समान कर लेता है। जो भी कीड़ा भुंगे के शब्द को मान लेता है, सुन लेता है, वो अपना रंग खोकर उसी के रंग में रंग जाता है, उसी की तरह हो जाता है। वो कोई बिरला ही सुखदायी कीड़ा होता है, जो पहली आवाजु में ही उस शब्द को पकड़ लेता है। कुछ कठोर दूसरी या तीसरी बार में मानते हैं, उसका शब्द सुनते हैं। पर जो कीड़ा उसका शब्द नहीं सुनता, वो वैसे ही रह जाता है, उसके समान नहीं हो पाता। साहिब धर्मदास को समझाते हुए कहते हैं कि ऐसे ही गुरु भी शिष्य को अपना शब्द सुनाकर अपने समान कर लेते हैं, पर शर्त यह है कि शिष्य उनके शब्द में रम जाए।