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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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साहिब और धर्मदास

पुरुष अवाज उठी तिहि बारा । ज्ञानी बेग जाहु संसारा ॥
जीवन काज अंश पठवायी । सुकृत अंश जग प्रगटे जायी ॥
दीन्ह आज्ञा तेहि को भाई । शब्द भेद वाही समझायी ॥
लावहु जीवन नाम अधारा । जीवन खेड़ उतारो पारा ॥
सुनत आज्ञा वहि कीन पयाना । बहु रि न आये देश अमाना ॥
सुकृत भवसागर चलि गयऊ । काल जाल ते सुधि बिसरयऊ ॥
तिन कहँ जाय चितावहु ज्ञानी । जेहिते पंथ चले निरवानी ॥
बंस ब्यालिस अंस हमारा । सुकृत गृह लैहँ औतारा ॥
ज्ञानी बेगि जाहु तुम अंसा । अब सुकृत अंश कर मेटहु फंसा ॥

तो कहा कि तब हम परम पुरुष की आज्ञा से तुम्हारे पास आए ।
धर्मदास तुम सुकृत अंशा । जा कारण हम कीन्ह बहु संसा ॥
पुरुषहिं आज्ञा तुम्हरे ढिग आये । पिछली हेत पुनि याद कराये ॥
दश औतार ईश्वरी माया । यह सब देख काल की छाया ॥
तुम जग जीव चितावन आये । काल फन्द तुम आई फँसाये ॥
अबहुँ चेत करो धर्मदासा । पुरुषहिं शब्द करो परकासा ॥
ले परवाना जीव चिताओ । काल जाल ते हँस मुक्ताओ ॥

साहिब ने कहा-हे धर्मदास ! तुम मेरे अंश हो, परम पुरुष ने तुम्हें जीवों को चिताने संसार में भेजा था, पर तुम काल के फँदे में फँस गये और भूल गये । अब नाम लो और जीवों को चिताओ ।

धर्मदास ने पूछा

कलियुग केर कहो परभाऊ । और हँस परमोधेउ काठ ॥
सो मोहि वरण कहो गुरु देवा । कौन जीव कीन्ही तुम सेवा ॥

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