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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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साहिब बन्दगी

यमदूत श्वेत अंग बनाकर आया और रानी से कहा—हे रानी! उदास क्यों बैठी हो, मैंने तो तुम्हें दीक्षा मंत्र दिया है, मेरा नाम ज्ञानी है। काल तुम्हें साँप रूप में डसने आया था, तब मैंने ही तुम्हारी रक्षा की थी। अब मैं तुम्हें लेने आया हूँ, चलो मेरे साथ।

रानी ने कहा

इन्द्रमती तब चीन्हे उ रेखा। जस कछु साहिब कहे उ विशेषा ॥
तीनों रेख देख चक माहीं। जर्द सेत अरु राता आहीं ॥
मस्तक ओछ देख पुनि ताको। भयो प्रतीत वचन को साको ॥
जाहु दूत तुम अपने देसा। अब हम चीन्हे उ तुम्हरो भेसा ॥
काग रूप जो बहुत बनाई। हंस रूप शोभा किमि पाई ॥
तस हम तोरा रूप निहारा। ऐ समर्थ बड़ गुरु हमारा ॥

तब रानी उसे पहचान गयी, क्योंकि साहिब ने उसे काल का रूप समझा दिया था कि उसका छोटा-सा मस्तक होगा, भँवरे की तरह काली आँखें होंगी। तो रानी ने कहा कि कौवे को हंस का रूप शोभा नहीं देता। हमारा गुरु बड़ा समर्थ है।

यह सुन काल निकट चल आवा। इन्द्रमती पर थाप चलावा ॥
थाप चलाय सुमुख पर मारा। रानी खसि परि भूमि मँझारा ॥
इन्द्रमती तब सुमिरन लाई। हे गुरु ज्ञानी होठ सहाई ॥

यह सुन काल ने इन्द्रमती को थप्पड़ मारा, जिससे रानी भूमि पर गिर पड़ी। इन्द्रमती ने साहिब को पुकारा कि रक्षा करो।

सुनत पुकार मुहि रहो न जाय। सुनहु धर्मनि यह मोर सुभाय ॥
रानी जबहीं कीन्ह पुकारा। ततछन मैं तहाँ पगु धारा ॥
देखत रानी भयी हु लासा। मन ने भाग्यो काल त्रासा ॥

साहिब धर्मदास से कहते हैं कि जब कोई मुझे सच्चे दिल से पुकारता है तो मुझसे रहा नहीं जाता, यह मेरा स्वभाव है। तो रानी ने जब पुकार की तो मैं तुरंत वहाँ पहुँचा। मुझे देख रानी प्रसन्न हो गयी और काल का डर जाता रहा।