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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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अनुरागसागर वाणी

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राय कहे मम प्राण पियारी । लेहु चिताय जो अबकी बारी ॥
तक्षक गरल दूर हो आयी । देहु परगना तोहि दिवायी ॥

इन्द्रमती ने राजा को पुकारा कि मुझे साँप ने डस लिया है । यह सुनकर राजा व्याकुल होकर दौड़ा हुआ आया और अच्छे वैद्य को बुलवाया । राजा ने कहा कि तुम मेरे प्राणों से भी प्यारी हो, तुम्हें नहीं जाने दूँगा, देखो, अभी सारा ज़हर दूर हो जायेगा ।

इन्द्रमती ने कहा

मंत्र मोहि लखाय सतगुरु, गरल मोहि न लागई ॥
होत सूर्य प्रकाश जेहि क्षण, अंध अघोर नशावई ॥

रानी ने कहा कि मुझे सदगुरु ने मंत्र दिया है, इसलिए मुझे ज़हर नहीं लगेगा । यह कह रानी साहिब के नाम का सुमिरन करती रही और कुछ ही देर में उठ बैठी ।

विष्णु जी ने दूत को भेजा

कहे विष्णु सुनहो यमदूत । सतहि अंग करो तुम पूता ॥
छल करि जाइ लिवाइय रानी । वचन हमार लेहु तुम मानी ॥

विष्णु जी ने यमदूत को कहा कि तुम श्वेत अंग धारण कर रानी को छल कपट से ले आओ और हमारा बचन मानो ।

दूत रानी के पास आया

कीन्हों दूत सेत सब अंगा । चलेउ नारि पहुँ बहुत उमंगा ॥
रानी सो अस वचन प्रकाशा । तुम कस रानी भई उदासा ॥
जानि बूझि कस भई अचीन्हा । दीक्षा मंत्र तोहि हम दीन्हा ॥
ज्ञानी नाम हमारो रानी । मरदो काल करौँ पिसमानी ॥
तक्षक काल होय तोहि खायी । तब हम राख लीन्ह तोहि आयी ॥
छोड़हु पलँग गहो तुम पाई । तजहु आपनी मान बड़ाई ॥
अब हम लैन तोहि कहँ आवा । प्रभु के दर्शन तोहि करावा ॥