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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 99 of 811

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Page 99
सर्गः ५ ]सुन्दरकाण्डम्८३

सुतः कर्णोऽस्य लिंगे गोकर्णं तद्वदस्ति हि । ततः खिन्नमनाभूयो पातालं रावणो ययौ ॥५४॥
मयगेहे निरीक्ष्याय देवीं मन्दोदरीं वराम् । मयं संप्राथर्यामास ददौ तां रावणाय सः ॥५५॥
ततो विवाहं निर्वर्त्य पाणिग्रहं ददौ मयः । रावणाय दृढां शक्तिममोघां शत्रुघातिनीम् ॥५६॥
दृष्ट्वा मन्दोदरा मन्द्यः प्राह मन्दोदरीमिति । तां नाम्ना रावणस्तुष्टस्त्वया स्वीयस्थलययौ ॥५७॥
ततो मात्रा धिकृतः स पुनस्तपुं मथान्वितः । गोकर्णं रावणो गत्वा तप्स्या लब्ध्वा विधेर्वरान् ॥५८॥
त्रैलोक्यं स्ववशे कृत्वा लङ्कायां राज्यमाप सः, तस्मान्सीतासमानेयं दृष्टा मन्दोदरा प्रिये ॥५९॥
लंकायां वायुपुत्रेण रावणाग्रे विनिद्रिता । मयोऽप्यासीच्च लंकायां गृहं कृत्वा यथासुखम् ॥६०॥
मयश्चैवांगयो नाम महान् वीरः प्रतापवान् । रात्रौ विनिद्रितो गेहे ब्रह्मदत्तवरन्सुधीः ॥६१॥
दशास्यहस्तात्तन्मृत्युर्विनिर्णिक्तं विचित्य च । तस्य वस्त्रं मारुतिना हतं सद्मनि वै पुरा ॥६२॥
तन्क्षिप्तमूर्ध्वपर्यङ्के रावणस्य कपिस्तदा । विभीषणस्य पर्यङ्के वसनं रावणस्य च ॥६३॥
विचिन्वत्यथ जानकीं म लङ्काया च मुहुः कपिः । ययावशोकवनिकां वृक्षप्रासादपण्डिताम् ॥६४॥
ददर्श तत्र प्रांशुं च शिंशपानाम पादपम् । तन्मूले राक्षसीमद्ध्ये ददर्शाविदिकन्यकाम् ॥६५॥
एकवेणीं कृशां दीनां मलिनाम्बरधारिणीम् । भूमौ शयानां शोचन्तीं रामरामेति भाषिणीम् ॥६६॥
कृतार्थोऽहमिति प्राह दृष्ट्वा सीतां स मारुतिः । शिंशपानगशाखाग्रपल्लवाभ्यन्तरे स्थितः ॥६७॥
पुरा दृष्टानलंकारान् तस्य देहे ददर्श न । ततः किलकिलाशब्दैर्ययौ तत्र दशाननः ॥६८॥
ददर्श रावणः स्वप्ने कपिः कश्चित्समागतः । अशोकवनिकाया सा दृष्टा तेन विदेहजा ॥६९॥

५४॥ उसके शिश्नाकार जगह कानके छेदकी तरह गढ्ढा हो गया। उसका सिर भी कर्णशंकुकी तरह गोल हो गया। ५४। अतएव पृथ्याक कलंक स्वरूप यह लिंग गोकर्ण नामसे विख्यात हुआ। तब खिन्नमना होकर रावण सुतलपातालको चला गया ॥ ५४ ॥ मयके घरमें सुन्दरी मन्दोदरीको देखकर मयसे रावणने प्रार्थना की। तब मयने रावणको वह कन्या दे दी। ५५। इस प्रकार मयने कन्याका विवाह करके रावणको एकदम बहुत सा वस्त्र आभूषण आदि दिया और शत्रुघातिनी, अमोघ दृढ़ शक्ति भी दी ॥ ५६ ॥ उस दवाकी कृपा दृष्टि अर्थात् मुख्य देखकर रावणने उसका नाम मन्दोदरि रखा और उसके साथ सन्तुष्ट होकर रावण अपने स्थानको चला गया ॥५७। तहां माताके धिक्कारनेपर रावण फिर गोकर्णके पास जाकर तप करने लगा। असीम अपनी तपस्याके बलसे रावणने ब्रह्मासे वर प्राप्त करके तीनों लोक वशन कर लिया और लङ्कापर राज्य करने लगा, हे प्रिये पार्वती इसी कारण हनुमान्ने सीताके समान मन्दोदरीको रावणके आगे सुहाम सोई हुए देखा था । बादमें तो मय दानव भी लङ्कामें घर बनाकर सुखपूर्वक रहने लगा ॥५८-६०। प्रतापी मयके भाई मय रात्रिके समय अपने भवनमें सो रहा था । विचारशील हनुमान्ने इसके दस मुखके रावणके हाथसे मृत्यु जानकर विचारसे उसके सर्ववस्त्रोंके लेकर सम्मुखमें रावणके ऊपर और बादमें रावणके वस्त्र ले जाकर विभीषणके पलंगपर रख दिया ॥ ६१-६३ । पुन हनुमान् मुहुर्मुहु जानकीजीको खोजने लगे। खोजते-खोजते वृक्षों तथा पासादोंसे सुशोभित अशोकवनिकामें गये ॥ ६४ । वहां उन्हें एक उत्कृष्ट शिंशपा (प्रशाम) का वृक्ष दिखायी दिया। इसके नीचे राक्षसियोंके बीचमें अवनि-कन्या जानकी जीको विराजमान देखा। ६५। उस समय शुष्क तथा दीन मुख होकर मलीन वस्त्र धारण किये हुए भूमिपर सोयी हुई रोती दुःखित मनसे रामका नाम जप रही थीं । उनके सिरके बालोंमें तैल आदि पर जानेसे वेडुनि बंध गयी था ॥ ६६ । सीताके दर्शनसे अपनेको कृतार्थ समझते हुए हनुमान्‌जी उस शिंशपावृक्षकी एक शाखाके अग्रभागके पत्तोंमें छिपकर बैठ गये ॥ ६७॥ उस समय सीताके शरीरपर एक शृंगार नहीं दिखायी दिये, जिनको कि हनुमान्ने पहिले सुग्रीवके पास देखा था। इतनेमें कुछ कोलाहलके साथ रावण वहां जा पहुंचा। ६८ । क्योंकि रावणको स्वप्नमें दिखायी दिया कि कोई वानर आया है और उसने