श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 525 of 811
Read in contextसर्गः १८ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५०९
जगाम दृष्ट्वाज्ञांतं दर्शयामास तां शिलाम् । समुद्रः कण्ठबद्धां लिपिं राजाऽपरो द्विजः ॥ ९०॥
तं तदा रोपयामास शृङ्गाग्रं वायुजो भुवि । तस्मिंश्च तटाके ह्यत्र विप्राः स्थिताः पुरा ॥९१॥
नृपं मोचयितुं ये ये सन्तापाः समागताः , तांश्चापि वायुपुत्रेणैव शमायितः ॥९२॥
द्विजहृत्तापशमनाद्भूत्तदाप्रभृतीदं तीर्थं नाम्ना तापशमं यत्र भ्रान्त्युद्भवत्पुनः ॥९३॥
राज्यदानेन रामस्यौदार्यं लोकान्वयोजितुम् । उक्तस्तीर्थसमीपस्थः शम्भुः संस्थापितः शुभः ॥९४॥
उद्धारेश्वरवेति नाम्ना मूर्तिः प्रकीर्त्तिता ।
स्नानं दिना तस्मिंस्तु नृणां तापत्रयं न हि ॥९५॥
ततः प्राह पुनर्विप्रान्हनूमांस्तुष्टमानसः । भूम्यन्तर्गुहां कृत्वा गुहां तत्र स्थाप्या भवेत् शिला ॥९६।
न भयं वोऽस्तु भो विप्रा युष्माकंसाधनाम्यहम् । तिष्ठाऽत्र न भेः कार्यं स्मरध्वं रघुनन्दनम् ॥९७॥
इत्युक्त्वा गुहरूपेऽभून्मूर्त्त्याऽभूद्द्विजपुंगवाः ।
तां शिलां स्थापयामासुर्गुहामध्ये प्रयत्नतः ॥९८॥
ततस्तुष्टा द्विजाः सर्वे जग्मुः स्वं स्वं गृहं प्रति । तदाऽऽरभ्य न केनापि तद्राज्यं हृतं कदा ॥९९॥
एवं शिष्य मया प्रोक्ता कथा भाया तवाग्रतः । पूर्ववद्राज्यं दृष्ट्वा कौतुकञ्चैव सादरम् ॥१००।
अद्यापि तत्र तैर्विप्रैस्तद्राज्यं भुज्यते सदा ।
ये ये जाता नृपा भूम्या रामाज्ञां मानयन्ति ते ॥१०१॥
एवं नाना कौतुकानि राघवेण कृतानि हि पुत्राभ्यां सीतयाऽथ भ्रातृभिर्बन्धुभिः सह ॥१०२॥
इति श्रीमत्कोटिरत्नचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे अभिषेककाण्डे
रामसाम्राज्यवर्णनं नामाष्टादशः सर्गः ॥ १८॥
सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥८८॥ इसके अनन्तर हनुमान्जीने उस शिलाको निकालकर उनके आगे रख दी और ब्राह्मणोंने उसे उस दुष्ट राजाके गलेमें बाँध दिया, समुद्रके सदृश लिखित उस शिलाको देखकर राजा बहुत चकराया ॥८९-९०॥ तब हनुमान्जीने उस राजाको पकड़कर उस सरोवरके तटपर ले गये और शृंगाग्रपर बैठा दिया, राजाको छुड़ानेके लिये जो सिपाही उनके पास आये, हनुमान्जीने अपनी लम्बी पूंछके द्वारा ही उन सबका सन्ताप हरण किया ॥९१-९२॥ ब्राह्मणोंका सन्ताप हेतु मारुतिने उस सरोवरपर हरण किया, इसलिये उस सरोवरका 'तापशमन' नाम पड़ गया ॥ ९३ ॥ राज्यदानसे रामकी उदारता संसारको दिखानेके लिए उसी स्थानपर हनुमान्जीने उद्धारेश्वर नामक शिवलिंगकी स्थापना की ॥ ९४ ॥ उस सरोवरमें स्नान करनेसे मनुष्योंके दैहिक, दैविक और भौतिक ये तीनों ताप दूर हो जाते हैं ॥ ९५ ॥ इसके बाद हनुमान्जीने उन प्रसन्नचित्त विप्रोंसे कहा- पृथिवीमें एक गुफा बनाकर उसमें यह शिला रख दो ॥ ९६ ॥ हे विप्रो, तुमको किसी प्रकारका भय नहीं है। मैं सदा तुम्हारे पास रहूँगा। तुम सब सर्वदा भगवान् रामका स्मरण करते रहो। इतना कहकर सेवक समक्ष हनुमान्जी अपनी उसी पाषाणमयी प्रतिमामें लीन हो गये। जैसा कि हनुमान्जीने बतलाया था, विप्रोंने गुफा खोदकर बड़े यत्नसे वह शिला उसीके अन्दर रख दी ॥ ९७-९८ ॥ इसके अनन्तर प्रसन्न मनसे वे ब्राह्मण लौटकर अपने-अपने घरोंको चले गये तबसे किसी राजाने उनके राज्यका हरण नहीं किया। श्रीरामदास कहते हैं- हे शिष्य ! मैंने भावी वृत्तान्त तुम्हें कह सुनाया। आज भी वे ही ब्राह्मण उस राज्यका उपभोग कर रहे हैं। पृथ्वीतलपर जितने राजे हुए, वे बराबर रामकी आज्ञाको मानते आये हैं। इस प्रकार अवधेश राम अपने पुत्रों, सीता तथा भाइयोंके साथ नाना प्रकारके कौतुक करते रहे ॥ ९९-१०२ । इति श्रीमत्कोटिरत्न-चरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित भाषाटीकासहित राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे अष्टादशः सर्गः ॥ १८ ॥