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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 426 of 811

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Page 426

४१० आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

वैष्णव्येकं न दृष्ट्वा स गत्वाऽसीन्निशिस्मितः । विमानाट्टालमारुह्य सौमित्रिं वै समाह्वयत् ॥५१॥
ऊर्मिला रामवाक्यं तच्छ्रुत्वा तु चालयत्पतिम् । ऊर्मिलाचालनाच्चाऽथ प्रबुद्धोऽभूत्स लक्ष्मणः ॥५२॥
रामशब्दं सोऽपि श्रुत्वा रतिशालाद्बहिर्ययौ । दत्त्वा प्रत्युत्तरं रामं ययौ वेगेन लक्ष्मणः ॥५३॥
एतस्मिन्नन्तरे रामो रोदनं नगराद्बहिः । शुश्राव स्त्राकृतं घोरं किमिदं चेति विस्मितः ॥५४॥
ततो दृष्ट्वा स सौमित्रं सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् । लक्ष्मणा रामवाक्यं तच्छ्रुत्वा दत्तास्तिजस्तदा ॥५५॥
प्रेष्य दूतान्कीर्तनस्थानादाहूयामास वेगतः । रामदूतास्तदाऽऽयान् कथं श्रीरामकीर्तनम् ॥५६ ।
असमाप्य विहायाद्य गच्छेम स्वामिनं प्रति नैवेद्य केचिदूचुस्ते पालनीया तु सेवकैः ॥५७॥
प्रभोराज्ञाऽद्य चास्माभिर्नो चेन्नः पातकं स्पृशेत् । केचिदूचुर्निदं तस्य कीर्तनं मङ्गलप्रदम् ॥५८॥
स्वाप्याज्ञाभङ्गादोषघ्नं कथं त्यक्त्वा प्रगच्छताम् । केचिदूचुः कीर्तनस्मान् श्रुत्वाऽस्मान् सुखी भवेत् ५९
इति संदिग्धचित्तास्ते न तदा राघव ययुः । ततो लक्ष्मणदूतास्ते रामं वृत्तं न्यवेदयन् ॥६०॥
ततः किंचित्क्रोधयुक्तः सौमित्रिं प्राह राघवः । मत्कीर्तनसमाग्रान्नाहं दण्डयितुं क्षमः ॥६१॥
तथाप्येतन्न योग्यं हि किंचिच्छिक्षां करोम्यहम् । इत्युक्त्वा तां तु रुदतीं पुनः श्रुत्वा बहिः प्रभुः ॥६२॥
विमानं प्राह गच्छाद्य बहिः पुर्याः स्त्रियं प्रति । तथेति गत्वाऽग्येन ययौ तन्नगराद्बहिः ॥६३॥
यत्र साऽतिविलापं स्त्री करोति सरयूतटे । तामञ्जनाभां रागे रुदतीं राघवोऽब्रवीत् ॥६४॥

राम उवाच

किं ते दुःखं वरस्त्राय का त्वं रोदिषि वै कथम् इति रामावचः श्रुत्वा सा रामं राक्षसमब्रवीत् ॥६५॥
चिरकालं करोम्यत्र रोदनं रघुनन्दन अद्य श्रुतं त्वया राम किंचिच्छ्रुयन्नयाम्बुनेः ॥६६॥

यहाँ कोई दासी नहीं दिखायी दी। सब सेवकोंको बुलाया। उनमेंसे भी कोई नहीं बोला। तब पहरेदारोंको पुकारा, किंतु उनमेंसे भी कोई नहीं बोला। जिससे रामचन्द्रजीको बड़ा विस्मय हुआ और विमानके ऊपरवाली अँटारीसे लक्ष्मणको पुकारा। रामचन्द्रकी आवाज उर्मिलाको सुनायी दी और उसने तुरन्त लक्ष्मणको जगाया। जागनेपर लक्ष्मणने भी रामकी आवाज सुनी और तत्काल उनकी बातका प्रत्युत्तर देकर तुरन्त रतिशालाके बाहर आकर वेगसे रामचन्द्रजीकी ओर चले ॥ ५१-५३ ॥ इधर रामचन्द्रजीने नगरके बाहर किसी स्त्रीका रोदन सुना : "है, यह क्या है !" यह कहकर वे बड़े विस्मित हुए ॥ ५४॥ तब तक लक्ष्मण भी आ पहुँचे और रामने उन्हें सब वृत्तान्त सुनाया। लक्ष्मणने तुरन्त अपने दूतोंको उस स्थानपर जानेकी आज्ञा दी, जहाँपर कीर्तन हो रहा था। लक्ष्मणके दूतोंने वहाँ पहुंचकर रामके दूतांत कहा—चलो, रामचन्द्रजी कबसे तुम सबको बुला रहे हैं। उन सबने जवाब दिया कि बिना रामकीर्तन समाप्त हुए मधूरा छोड़कर हम सब कैसे आयें। उनमेंसे किसीने कहा कि सेवकोंका धर्म है, स्वामीकी आज्ञाका पालन करना। ५५-५७ ॥ यदि उनकी आज्ञा न मानगे तो हमको पातक लगेगा। उनमेंसे कोई बोल उठा कि यह रामकीर्तन तो विविध प्रकारके पातकोंको नष्ट करनेवाला है। अब इसको छोड़कर कहाँ जायेंगे ॥ ५८ ॥ कुछ लोगोंने कहा कि जब वे हमको कीर्तनमें आया सुनेंगे तो प्रसन्न होयेंगे ॥ ५९ ॥ इस प्रकार असमञ्जसमें पडकर वे लोग रामके पास नहीं आये। इधर लक्ष्मणके दूतोंने रामके पास आकर उनका हाल सुनाया। ६०॥ तब किंचित् क्रोधयुक्त रामने लक्ष्मणसे कहा कि यद्यपि मैं कीर्तन सुननेमें मग्न सेवकोंको दण्ड नहीं दे सकता ॥ ६१ ॥ किन्तु यह भी उचित नहीं है कि मै उन सबको कुछ शिक्षा भी न दूँ। इतना कहकर रामने फिर वह नगरके बाहरवाला रोदन सुना ॥६२॥ तब उन्होने विमानको आज्ञा दी कि नगरके बाहर कोई स्त्री रो रही है, तुम उसके पास चलो। 'बहुत अच्छा' कहकर विमान चल पडा और सरयूके तटपर जा पहुँचा, जहाँपर वह स्त्री विलाप कर रही थी। अञ्जनके समान उस काली-कलूट्टी स्त्रीको देखकर रामने पूछा—॥ ६३ । ६४ ॥ तुम्हे क्या कष्ट है ? तुम कौन हो और क्यों इस प्रकार रो रही हो ? रामकी बात सुनकर उस नारीने कहा—॥ ६५ ॥