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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 392 of 811

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Page 392
३७६आनन्दरामायणे[ सर्ग ८

युद्धं कुरु नृपैर्घोरैः शृणु मद्वचनं प्रभो । मा साहसं कुरुष्वात्रार्थये त्वां मुहुर्मुहुः ॥६२॥
इति तस्या वचः श्रुत्वा तामाश्वास्य पुनः पुनः । उपसंहारयामास मोहनास्त्रं स लीलया ॥६३॥
तदा ते पार्थिवाः सर्वे श्रुत्वान्योन्यं वधू छलन् । शत्रुघ्नतनयेनेति क्षोभात्स्वैः स्यन्दने स्थिताः ॥६४॥
निर्ययुः कोटिशो योद्धुं स्वस्वसेनायुता जवात् । चण्डिकायाः सुमन्त्राश्च पूर्ववैरेण दर्पिताः ॥६५॥
दृष्ट्वैनेमिमार्गेण ददृशुस्तं रथस्थितम् । युक्तं मदनसुन्दर्या बिभ्रतं मालिकां हृदि ॥६६॥
ततस्तं मुमुचुः सर्वे नानास्त्राणि सैनिकाः । यूपकेतुस्तदा वेगाद्गुणकृत्य महद्धनुः ॥६७॥
वायव्यास्त्रेण तत्सर्वानुद्धूय दशदिक्षु सः । प्रक्षिपत्पार्थिवान् सैन्यान्वाहनाग्र्यस्थितान् ॥६८॥
तदा स कंबुकण्ठोऽपि पूर्ववैरमनुस्मरन् । चण्डिकायाः सुमन्त्राश्च स्वयंवरसमुद्भवम् ॥६९॥
निमेषान्निजकन्याया वैभ्तो हरणं बलात् । महाक्रोधान्वितर्यद्यौ स स्वसैन्येन परिवेष्टितः ॥७०॥
कुर्वन् दुंदुभिनिर्घोषं युद्धार्थं यूपकेतुना । यूपकेतुरपि श्रुत्वा दुन्दुभीनां महन्स्वनम् ॥७१॥
कान्तिपुर्यूताद्द्वारपुरतः प्रस्थितो रथी । टङ्कृत्य महच्चापं सन्दधे शरमुत्तमम् ॥७२॥
ये ये वीराः पुरद्वारान्निर्गताश्च वहिः क्षणे । तान् जघान क्षणादेव प्रेतदुर्गं रुगोधमः ॥७३॥
तं दृष्ट्वा यूपकेतोश्च कंबुकण्ठः पराक्रमम् । ययौ स्वयं स्यन्दनेन प्रेतसंधं विदार्य च ॥७४॥
छेपसैन्येन संयुक्तो यूपकेतुं रुधा जगाद तदऽहं यूपकेतं म प्रथा म्वं मङ्गर कुरु ॥७५॥
किमेतान्मशकान् हत्वा पौरुषं मन्यसे जड । इत्युक्त्वा सप्तभिशार्यूपकेतुं जघान सः ॥७६॥
तान्बाणानागतान् दृष्ट्वा यूपकेतुर्निजैः शरैः । संछिन्त्वा नवबाणैस्तच्चापं सारथिनं ध्वजम् ॥७७॥
कवचं मुकुटं छित्वा जघान तुरगानपि पद्भ्यां तदा कंबुकण्ठो गदामादाय दुद्रुवे ॥७८॥

ऐसी अवस्था में युद्ध कैसे कराओगे ? आज तुम संग्राम न करो । मुझे शीघ्र अयोध्या पहुँचा दो और वहाँ से राम-चन्द्रजी की विशाल सेना लेकर आओ, तब युद्ध करो हे प्रभो ! ऐसा साहस इस समय करना ठीक नहीं है। मैं बार-बार यही विनती करती हूँ ॥६१। ६२। इस प्रकार मदनसुन्दरी का वचन सुनकर उन्होंने उसे आश्वासन दिया और मोहनास्त्र का संवरण कर लिया । ६३ ॥ जब उन राजाओं ने किसी के मुख से सुना कि शत्रुघ्न-के पुत्र यूपकेतुने मदनसुन्दरी का हरण किया है तो अपने-अपने रथों पर सवार हो-होकर बड़ी-बड़ी सेना लिये उसके साथ व लड़ने को निकल पड़े। एक तो चण्डेश और मन्त्रणाक्ष का ही वैर उन लोगों के मन में था, दूसरे अब मदनसुन्दरी के हरण से उनका क्रोध और भी अधिक हो गया ॥६४। ६५। फिर रथ या, शत्रु के रथके पहियाका रास्ता देखते हुए वे चले और थोड़ी ही दूर जाकर उन्होंने देखा कि यूपकेतु मदन-सुन्दरी के साथ बैठा है और उसके गले में वरमाला पड़ी हुई है ॥ ६६ ॥ देखते ही सब राजाओं ने एक साथ उस वीर बालक पर कितने ही शस्त्रोंका प्रहार कर दिया । तब यूपकेतु ने वेग के साथ अपने धनुष को टंकार किया । ६७ ॥ और वायव्य अस्त्र का प्रयोग करके इन सब राजाओं को रथ, वाहन तथा सेना समेत उठाकर दूर फेंक दिया ॥ ६८ । महाराज कम्बुकण्ठ भी पूर्वस्नेह को स्मरण करके विशेषकर उस समय चण्डिका अपनी कन्या का हरण देखकर अपनी सेना के साथ दुन्दुभिका युद्ध बजवाते हुए दुन्दुभी का घोष करते हुए निकले ॥६९। यूपकेतु ने भी जब दुंदुभीकी गर्जना सुनी तो कान्तीपुरके उनके द्वारपर पहुँचे और अपने धनुषका टंकार करके उसपर एक उत्तम बाणका संधान किया ॥ ६९-७२ । उस पुरद्वार से जो-जो योद्धा निकलते, उनको अपने बाणोंसे यूपकेतु बराबर मारते जाते थे । इतने थोड़े ही देर में वह द्वार मृतकों से भर गया । ७३ । इस तरह यूपकेतुका पराक्रम देखकर राजा कम्बुकण्ठ स्वयं अपने रथ पर सवार होकर उन शवों को चीरते हुए बड़ी वृद्ध सेना के साथ यूपकेतु के सामने जा पहुंचे और क्रोध में भरकर उन्होंने कहा-अब तू मेरे साथ संग्राम कर । ७४॥ ॥७५॥ अरे जड ! इन मच्छडोंको मारकर क्या तू अपने पौरुषको पौरुष मानता है ? ऐसा कहकर कम्बुकण्ठने सात बाणों से यूपकेतु पर प्रहार किया । ७६ ॥ उन बाणों को अपनी ओर आते देखकर यूपकेतुने अपने नौ बाणों से कम्बुकण्ठके बाणों, धनुष, सारथी, ध्वजा, कवच और मुकुट को काट डाला और घोड़ों को भी मार दिया । तब