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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 391 of 811

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Page 391

सर्गः ८ ] विवाहकाण्डम् १७५


हतः सा जानकी श्रुत्वा विह्वला क्षिप्तमानसा । दुद्राव राघवप्रेग्ने मा मद्ये तूष्णीं कथं स्थिताः ॥४५॥
इति तान् प्राह वैदेही तदा सर्वेऽनितिष्ठिताः । त्यक्त्वोपादाशनं वेगेन मन्तोद्यर्थे ममूद्यताः । ४६।
तदा तान्विह्वलान्दृष्ट्वा नारदः प्राह राधवम् कांतिश्च यूपकेतोः प्रयाणादिप्रसादरात् ॥४७॥
हास्यं राघवः धृत्वा किञ्चित्प्रत्ययमाददा लक्ष्मणं प्राह वेगेन शत्रुघ्नोऽथैः मऋतु । ४८
सेनया चतुरङ्गिण्या उवन्कांतिं द्रुतादिभिः मथेति लक्ष्मणाथोत्क्त्वा याग्राहागनिपाय सः॥ ४९॥
सेनया बालकंवंगारुहलूनं प्रैषयन्निति । शर्म नन्त्राऽथ शत्रुघ्नः शीघ्रं स्यन्दनमस्थितः ॥५०।
ययौ कांतिसमीपं स षष्ठेऽहनि मुदान्वितः एतस्मिन्नन्तरे कांतिपुर्यां तत्र स्वयंवरे । ५१॥
सभायां राजशार्दूलाः मस्थितास्ते मुदान्विताः । अथ सा शिविकामारु ह्यययौ मदनसुन्दरी । ५२॥
किञ्चिन्म्लानमुखी दुःखामस्मरन्ती नारदेरितम् । वृद्धोघवाता तां सर्वान् दर्शयामास पार्थिवान् ॥५३॥
यूपकेतुस्तदा वेगाद्गत्वा तूणीं सभांगणम् । मोहन स्त्रं विमुच्याथ मोहयामास तां सभाम् ॥५४॥
मोहितैर्मोहनास्त्रेण न्यस्तां तद्वाहकैर्भुवि । रथेन शिविकां गत्वा धृत्वा मदनसुन्दरीम् ॥५५॥
निजाभिधानं मथाऽथ तां तुष्टासकंगमद । अथ सा त्रपयामास वीर मदनसुन्दरी । ५६।
सुमोच मालो तन्कण्ठे नवरत्नमयीं शुभाम् । ततः स यूपकेतुहि रथे मदनमन्दरीम् ५७॥
निवेश्य कांतिपुर्याः सच वेगेन्यो स्थितोऽभवत् । नापाह द्य.तंतं वीरसुन्दरीं त्वं भयं त्यज । ५८।
जित्वा सर्वान्नृपानद्य मया गच्छाम्यहं पुरि तत्तस्य वचनं श्रुत्वा सा प्राह वचनं तदा । ५९।
वहवः सन्ति राजानस्त्वमेकः स्वल्पसेनया । असंख्यव्रातानि सैन्यानि तेषां पश्य समन्ततः ॥६०॥
कथ युद्धं भवेत्तत्र मा कुरुष्वद्य मंगरम् शीघ्रं मां नय स.फेन ततो रामेण सेनया । ६१।


गङ्गीलौटे ॥ ४३ ॥ यह सुन लक्ष्मण हँसकर हाथ थामकर वचन कहा। जब रामने यह सुना तो ज्ञातानों के साथ-साथ वे भी विह्वल हो उठे ॥ ४४ ॥ जानकीने सुन सा०ह्रै भी विह्वल तथा क्षिप्त होकर दौड़ती हुई रामके पास पहुंची और कहा कि आप लोग यूपकेतुका अशुभिन्वत देखकर भी चुपचाप बैठे हैं ? ॥ ४५ ॥ यह सुनकर सब लोग घबड़ा उठे और भोजन त्यागकर तुरंत उसका तैयारी कर दिये ॥ ४६ ॥ इस प्रकार सबको व्याकुल देखकर नारदजन रदन सहितराक्षस वृत्त यंत बतलाया और यूपकेतुके प्रस्थानकी भी बात कह सुनाई ॥ ४७ ॥ यह हास्य सुना ता रामको थोरा सन्तान हुआ और तुरंत लक्ष्मणको आज्ञा दी कि सग चतुरङ्गिणी सेना लेकर शत्रुघ्न अभी कांतिपुरी जायं । "बहुत अच्छा' कहकर लक्ष्मणने भोजन आदि करवाकर राजन ह् सेना और कुछ अरि वीर बालकोंके साथ शत्रुघ्नको कांतिपुरी भेजा रामको प्रणाम करके शत्रुघ्न रथपर सवार हुए और प्रसन्नता पूर्वक प्रस्थान कर दिये ॥ ४८-५० ॥ इस तरह अयोध्यासे चलकर छठे दिन शत्रुघ्न कांतिपुरीके पास पहुंच गये उधर कांतिपुरीमें स्वयंवर हो रहा था ॥ ५१ ॥ सभा मण्डपमें बहुतस राज हर्षपूर्वक बठे हुए थे। इतनेम मदनसुन्दरी पालकीमं बैठी हुई सभामें आयी ॥ ५२ । उस समय वह दुःखस नारदका वानीका स्मरण कर रही थीं। इस कारण उसका मुख कुम्हलाया हुआ था। सभामें पहुंचकर वृद्धा वार्या न सब राजाओंको दिखलाया ॥ ५३ ॥ इसी समय वेगके साथ यूपकेतु सभाभवनमें पहुंचे और मोहनास्त्रका प्रयोग करके उन्होंने सारी सभाको मूच्छित कर दिया । ५४ ॥ महनास्त्रसे मोहित होकर शिविकावाहकोने भी शिविका जमीनपर रख दी । इतनेम रथपर बैठे हुए यूपकेतु शिविकाके पास पहुंचे और मदनसुन्दरीका हाथ पकड़कर अपना नाम बताया, जिससे वह बहुत प्रसन्न हुई और वीर यूपकेतु-के वरकर उसन उनके गलयं वह नवरत्नमयी वरमाळा डाल दी। सब प्रसन्न होकर यूपकेतुने मदनसुन्दरीको रथमें बिठा लिया ॥ ५५-५७ ॥ तब कान्तिपुरीसे बाहर निकलकर वे एक स्थानपर रुक गये । वहाँपर उन्होंने मदनसुन्दरीसे कहा कि अब तुम किसी प्रकारका भय न करो, ॥ ५८ ॥ मैं सब राजाओंको जीतकर तुम्हारे साथ अयोध्यापुरी चलूंगा । यूपकेतुकी बात सुनकर उसने कहा - ॥ ५९ ॥ ये राज बहुतसे हैं और युद्ध अकेले हें, तुम्हारे साथ सेना भी थोड़ी सी है और देखों न उनकी असंख्य सेना चारों ओर दबी हुई हैं ॥ ६० ॥