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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 361 of 811

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Page 361

श्रीसीतापतये नमः

श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गत–

आनन्दरामायणम्

'ज्योत्स्ना'ऽभिधया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्


विवाहकाण्डम्

प्रथमः सर्गः

(स्वयंवरके प्रसंगमें रामका तथा भूरिकीर्तिकी पुरीको प्रस्थान)

श्रीरामदास उवाच

अथ रामः सभामध्ये मन्त्रिभिः परिवेष्टितः । तस्थौ सिंहासने रम्ये वरच्छत्रोपशोभितः ॥ १ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र कश्चिद्दूतः समाययौ । नत्वा सभायां श्रीरामं स्वामिवृत्तं न्यवेदयत् ॥ २ ॥
पूर्वदेशाधिपतिना राज्ञा श्रीभूरिकीर्तिना । प्रेषितोऽस्मि महाराज द्रष्टुं त्वत्पादपङ्कजे ॥ ३ ॥
पत्रं पाठयित्वा श्रीराम कार्या मत्स्वामिने कृपा । इत्युक्त्वा रामदूतस्य करे पत्रं समर्पयत् ॥ ४ ॥
रामदूतोऽपि सौमित्रेः पुरस्तात्पत्रमादधात् । नत्वाऽऽयामास वेगेन गत्वा तस्थौ निजस्थलीम् ॥ ५ ॥
ततः स लक्ष्मणः पत्रं वस्त्रबन्धनवेष्टितम् । समुद्घाट्य राघवाग्रे पपाठ मञ्जुलस्वरः ॥ ६ ॥
हेमकृत्रिमपुष्पाद्यैरङ्कितं कुङ्कुमान्वितम् । दर्शनादेव माङ्गल्यसूचकं तोषकारकम् ॥ ७ ॥
उवाच पत्रलिखितैरक्षरैर्लक्ष्मणः शनैः । स्थितः श्रीरामपुरतो वरासिंहासनांतिके ॥ ८ ॥

श्रीमान् श्रीराघवेन्द्रो जयतु दशशिरश्छेदनाथं जगत्त्यां
कौसल्यायां नृपेंद्राद्दशरथतनयोऽसि नाम्नाऽवतीर्णः ।
तस्याहं भूरिकीर्तिः पदजलहरुहयोगन्धमात्रातुकामः
कृत्वा नैजं शिरस्तु भ्रमरवदनिशं प्रार्थनां प्रार्थयामि ॥ ९ ॥


श्रीरामदास बोले—एक दिन रामचन्द्र सभामें अपने राजसिंहासनपर बैठे थे। उनके ऊपर सुन्दर छत्र लगा हुआ था और उनके चारों ओर कितने ही मंत्री बैठे हुए थे। इसी समय एक दूत आया और वह अपने प्रभुका सन्देश सुनाने लगा। उसने कहा— पूर्व देशके अधिपति महाराज भूरिकीर्तिने आपके चरणोंका दर्शन करनेके लिए मुझे भेजा है। आप मेरे स्वामीपर कृपा करके यह पत्र पढ़ लीजिए। इतना कहकर उसने वह पत्र रामके दूतको दे दिया। उस दूतने लक्ष्मणके हाथमें दिया और प्रणाम करके पूर्ववत् बैठ गया ॥ १-५ ॥
लक्ष्मणने सुन्दर कपड़ेमें बँधे हुए उस पत्रको खोला और मधुर स्वरसे बाँचकर रामको सुनाने लगे। पत्रपर सुवर्णके फूल बने हुए थे और कुमकुमके छींटे पड़े थे। जिसे देखनमात्रसे वह मांगल्‍यसूचक तथा आनन्ददायक प्रतीत होता था ॥ ६॥ ७ । पत्रमें जो लिखा था, उसे रामके पास जाकर धीरे-धीरे लक्ष्मण सुनाने लगे—। ८॥ रघुकुलमें उत्पन्न श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जो राम रावणको मारनेके लिए दशरथके पुत्र