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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 233 of 811

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Page 233

सर्गः ३ ] यागकाण्डम् २१७


तृतीयः सर्गः

(रामके यज्ञीय अश्वका सब ओर घूमकर अयोध्या लौटना)

श्रीरामदास उवाच

अथ मुक्तस्तदा वाजी राघवेण महात्मना । यज्ञांगः श्यामकर्णः स पूर्वदेशं ययौ जवात् ॥१॥
शत्रुघ्नेन च सैन्येन प्राप्तो भागीरथीपटम् । एतस्मिन्नन्तरे रामः स्वप्रतापं प्रदर्शयन् ॥२॥
चकार कौतुकं तत्र शत्रुघ्नस्य पुरो महत् । ब्रह्मावर्ते महादेशं त्यक्त्वा गङ्गातटं प्रति ॥३॥
यावत्प्राप्ताः श्यामकर्णश्चावदामूर्द्धनेर्निधा । गङ्गायां च महापूरो यत्र नौकाऽपि कुण्ठिता ॥४॥
शत्रुघ्नेनापि तद्दृष्ट्वा कुण्ठितां गतिमीक्ष्य च । कालानिक्रमभीत्या स निश्चिन्तं व्यचिन्तयन् ॥५॥
आदावेवापि मे विघ्नमुत्पन्नं गमने महत् । ग्रामे प्राथमिके यद्वन्मक्षिकापतनं तथा ॥६॥
तदीदानीं रामचन्द्रप्रतापेनास्तु मे गतिः । निश्चित्येत्थं स शत्रुघ्नो रथस्थो जाह्नवीतटे ॥७॥
स्थित्वा प्रोवाच गङ्गां प्रतिपूज्य मवित्वरम् । शृण्वन्तु सर्वलोकेषु मुनिदेवगणेषु च ॥८॥
देवि गङ्गे महापुण्ये यदि सत्यं शृणुष्वमे । दीयतां तर्हि पंथा मे शीघ्रं सैन्ययुतस्य च ॥९॥
इति शत्रुघ्नवचनं श्रुत्वा सा जाह्नवी तदा । स्ववेगं मंदयामास इरोदरं चाप्रदर्शयत् ॥१०॥
पद्भित्रोंऽजो तदा शीघ्रं परं तीरं ययौ क्षणात् । तथा सैन्येन शत्रुघ्नः ससुमन्त्रः ममाययौ ॥११॥
मागधाख्यं महादेशं स एव कीकटः स्मृतः । पूर्वरूपं महापूरो जाह्नव्यां मयभूव ह ॥१२॥
प्रतापं रामचन्द्रस्य सर्ववुद्ध्या महाद्भुतम् । चक्रुन्ते जयशब्दांश्च सीतारामस्यच मुहुः ॥१३॥
श्यामकर्णस्ततः शीघ्रं ययौ पूर्वांदिशं प्रति । मगधेशो नृपश्चाथ श्रुत्वा तुरंगमागतम् ॥१४॥
प्रत्युज्जगाम सैन्येन पुरुरुन्द्याथ वारणम् । निनायाश्वं पठित्वा मङ्गलपत्रं पुरं निजम् ॥१५॥


रखना भूलना नही। रामचन्द्रजीका शिक्षाका अनुकरण करके लक्ष्मणजीने वैसा ही किया, जैसा रामने कहा था ॥ ६२।६३ ॥ इति श्रीशतकोटिपरिमितहरिकथामृतान्तर्गतानन्दरामायणे राज्यकाण्डेयश्वमेधविधौत 'ज्येत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते यागकाण्डं लक्ष्मणाज्ञाकरणं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

श्रीरामदासजी फिर कहने लगे—रामचन्द्रजीके द्वारा छोड़ा हुआ वह यज्ञका अङ्गरूप श्यामकर्ण घोड़ा अयोध्यासे बड़े वेगके साथ पूर्व दिशाकी ओर चला ॥ १ ॥ पतन चलते शत्रुघ्न, सुमन्त तथा विशाल सेनाके साथ वह अश्व जाकर भागीरथी गङ्गा तटपर पहुंचा। इधर रामचन्द्रजीने अपना महिमा दिखाकर इच्छासे शत्रुघ्नजीके सामने एक विचित्र कौतुक उपस्थित किया वह यह कि ब्रह्मावर्त देशको छोड़कर गङ्गातट पहुंचत-पहुंचते उनके कान जा जुड़ा औ बन था वह सब समाप्त हो गया। गङ्गाका बाढ़से एक स्थानपर उनकी नौका भी रुक गयी ॥ २-४ ॥ शत्रुघ्न उस दारुण समयको देखा तो देर हो जानेके भयसे मन ही मन सोचने लगे और 'पहिले ही आवाम इतना बड़ा विघ्न आ पहुंचा। यह वही कहावत चरितार्थ हुई कि 'पहल ही ग्रासमे मक्खी आ गिरी' ॥ ५ । ६ ॥ अब मुझे इस समय केवल रामचन्द्रजीके प्रतापका भरोसा है। उसीसे मेरा निस्तार होगा । इस प्रकार निश्चय करके शत्रुघ्नजी रथपर बैठे ही बैठे जाह्नवीके तटपर आकर कहने लगे—॥ ७ ॥ हे महापुण्यशालिनी गंगे ! यदि आप यदि भगवान् रामचन्द्रजी सच्चरित्र हो तो आप सेनासहित मुझे रास्ता दे दीजिए । ८ । ९ ॥ इस प्रकार शत्रुघ्नके वचनको सुनकर गङ्गाजीने वेगको मन्द करके अपने मध्य भागसे शत्रुघ्नको रास्ता दे दिया । १० ॥ तब क्षणभरमें घोड़े और पैदल सैनिक चलकर गङ्गाके उस पार पहुंच गये । इस तरह समन्य शत्रुघ्न सुमन्त्रके साथ मगधदेश मध्यम जा पहुंचे, जिस देशको कीकट भी कहते है उन के घोड़े पार उतर जानेके बाद गङ्गाका प्रवाह पूर्वरूप वेगवान् हो गया॥११ ।१२॥ मगधनिवासी लोग रामचन्द्रके अद्भुत प्रतापको समझकर सीतारामके नामके जयजयकार करने लगे ॥ १३ ॥ वहाँसे अश्वमेध यज्ञके लिए छोड़ हुआ श्यामकर्ण घोड़ा पूर्व दिशाकी ओर चला। राजा मगधेश घोड़ेको आया हुआ सुनकर हाथीकी सवारीपर चढ़ तथा सेनाको लेकर अगवानीके लिए गये । घोड़ेके मस्तकपर बँधे हुए पत्रको पढ़कर उसकी नगरमें ले गये