श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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Read in context२१६ आनन्दरामायणे [ सर्ग २
यन्त्यान्कामान् रामचन्द्रश्चिन्तयामास चेतसि । तांस्तानुभौ मणी शीघ्रं कल्पयामासतुर्द्रुतम् ॥४७॥
यथार्थान्ताऽपि यान् कामांश्चिन्तयामास चेतसि। कामधेनुर्ददौ तांस्ताञ्छीघ्रं त्रैलोक्यदुर्लभान् ॥४८॥
सर्वत्र यज्ञवाटे हि द्विजार्यैश्च समन्ततः। पङ्क्तिषु भूमिजादीनां परिवेषणकर्मणि ॥४९॥
स्त्रीणां कङ्कणनादश्च शुश्रुवे नूपुरध्वनिः। अथ रामश्च सौमित्रिं समाहूयेदमब्रवीत् ॥५०॥
सीमाचारान्समाहूय मम वाक्यञ्च सादरम् । आज्ञापयस्व शीघ्रं त्वं शासनं यन्मरोच्यते ॥५१॥
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽश्रमी यतिः। यःकश्चिद्याममायाति पथिकः स समाज्ञया। ५२॥
निवारणीयो युष्माभिर्न कदाप्यध्वरे मम। ममाज्ञां न प्रतीक्षध्वं कोपः कार्यो न कस्यचित्। ५३॥
इति रामवचः श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स लक्ष्मणः। सीमाचारान समाहूय राघवोक्तं न्यवेदयत् ।५४॥
ततो रामः पुनः प्राहः समाहूयाथ लक्ष्मणम्। ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थाश्रमी यतिः। ५५॥
मुनीनां दायिनां दाराः शिष्याः सम्बन्धिनास्तथा। पौरा जानपदाश्चास्तु तेषां संबधिनः स्त्रियः ॥५६॥
दासीदासजनाः सर्वे यद्यद्वाञ्छन्ति लक्ष्मण। मामपृष्ट्वा तु सर्वेषां दातव्यं ह्यविचारितम् । ५७॥
अन्त्यजावधि सर्वान्हि तोषयस्व निरन्तरम् । न केषामभिलाषा च विफला हि विधीयताम् ॥५८॥
अयोध्यां कामधेनुं च जानकीं कौस्तुभं मणिम् । चिन्तामणिं पुष्पकं च राज्यं कोशादिकं च मे ॥५९॥
एतेष्वपि च यो यद्वै याचयिष्यति तन्नया। न दत्तं चेति वै श्रुत्वा ममानोषो भविष्यति ॥६०॥
अतो ज्ञात्वा भयं मत्तो दत्तस्व ह्यविचारत। याञ्चाभङ्गः कृतश्चेद्धि मन्छिरोद्रोहो भविष्यति ॥६१॥
सदा स्मर शिरं मे त्वमिमां लक्ष्मण सादरम्। इति रामकृतां शिक्षाङ्गीकृत्य स लक्ष्मणः ॥६२॥
तथा चकार तत्सर्वं यथा रामेण शिक्षितम् ॥६३॥
इति श्रीमन्महीपतिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे यागकाण्डे
लक्ष्मणाज्ञाकरणं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
वहाँपर आये हुए सब ऋषि इच्छ भोजन कर करके प्रसन्न हो रहे थे । ४५ । ४६ ॥ जिन जिन वस्तुओंको राम-
चन्द्रजीने अपने मनमें चाहा उन सबको उनके दो मणियों (कौस्तुभमणि तथा चिन्तामणि) ने बातकी बातमें
पूर्ण कर दिया ॥ ४७॥ इसी तरह सीताजीने जो कुछ चाहा, सो कामधेनुने त्रैलोक्यकी दुर्लभ वस्तुओंको भी
देकर उनकी इच्छा पूरी की । यज्ञभूमिके चारों ओर जब ब्राह्मणोंक मण्डली भोजन करनेके लिए बैठती थी
और स्त्रियाँ उनका भोजन परोसनेके लिए आती थीं तब उनके भूषणोंकी मधुर ध्वनि सुनायी देती थी। इसके
तदनन्तर रामचन्द्रजीने लक्ष्मणको बुलाकर इस प्रकार समझाया - । ४८। ४९॥ ५०॥ हमारे यज्ञभूमिके आस-
पास रहनेवाले निवासियोंको सादर बुलाकर हमारी तरफसे यह समझा दो कि आश्रम लेकर जो कोई
ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ सन्यासी मुनियोंके पण्डितों, उनके वस्त्र, शिष्य सम्बन्धी, पुरवासी, देशनिवासी और
उनके सम्बन्धी, जो कोई यहाँ आ जाय, उसे कोई न रोके । उसका सत्कार करनेके लिए मेरी आज्ञाकी प्रतीक्षा
करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ५१-५३ ॥ रामचन्द्रजीके आज्ञानुसार लक्ष्मणजीने सब आस-पासके
निवासियोंको जाकर समझा दिया। कुछ देर बाद रामचन्द्रजीने फिर लक्ष्मणको बुलाकर कहा कि मुनियोंकी
स्त्रियों तथा बच्चों आदिको अथवा दास दासियोंको जिस किसी वस्तुकी आवश्यकता हो, वह बिना मुझसे पूछे
उनके इच्छानुसार देते जाओ ॥ ५४-५७॥ चाण्डालसे लेकर विप्रतक प्रत्येक प्राणीको सन्तुष्ट करो। किसी को
किसी प्रकारका कष्ट न होने पाये। किसीकी कोई अभिलाषा विफल न हो। अयोध्या, कामधेनु, सीता,
कौस्तुभमणि पुष्पक विमान, राज्य तथा कोशादिक इन सब वस्तुओंको भी देनेसे यदि तुमने इनकार किया
तो मैं तुम्हारे ऊपर बहुत नाराज होऊँगा। इसलिए मेरे क्रोधसे डरते हुए बिना किसी प्रकारका विचार
किये सब अभ्यागतोंको उनकी अभिलषित वस्तुएँ देते जाओ। तुम किसीकी माँग खाली करोगे
तो तुम्हें मेरा सिर काटनेका पातक लगेगा ॥५८-६१॥ हे लक्ष्मण ! सदा मेरी इन बातोंका ख्याल