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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 228 of 811

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Page 228
७१२आनन्दरामायणे[ सर्गः १

...समुद्रान्तानथ तथा दूता महाजवाः। जनकाय प्रेषणीयाः केकटाद्यनृपेष्वथौ ॥४३॥
...सख्यायाः सुमंत्राद्याः प्रिनंगं प्रति लक्ष्मण। श्यामांध्रिः श्यामकर्णश्च श्यामपुच्छः सितः शुभः ॥४४॥
महादामार्घ्यवस्त्रैर्दव्यैरागमनेन च शोभनीयाचापवर्गमुक्तादार्ममनागमः । ॥४५॥
हर्म्यभिः शुक्लवस्त्रैश्च वर्णगन्धविभूषणैः । तस्य भाले हेमपत्रे लेखनाय स्फुटाक्षरैः ॥४६॥
कोमलेन्द्रस्य रामस्य यज्ञांगतुरंगमो ह्ययम् । ज्ञेयः सर्वैर्नृपैर्मुक्तः कृतै भुम्पाः प्रदक्षिणाम् ॥४७॥
यस्यास्ति बलं तेनासौ बंधनीयोऽद्यसुत्तमः । नोचेत् क्रोधाच्च मित्राप्त पुरस्कृत्य बलैः सह ॥४८॥
स्वकुटुम्बैर्नागरैश्च तथा जानपदैः सह। आगन्तव्यं नृपतिभिर्यज्ञांगाश्वानुवर्तिभिः ॥४९॥
यज्ञभूमिमवोध्यायां युद्धेर्जित्वा महोद्धतान्। एवं पत्रं बंधयित्वा मुक्तामणिर्विचित्रितैः ॥५०॥
अनन्तरंः साभयित्वा सिद्धः कार्यश्च मण्डपे सिद्धः कार्यः स शत्रुघ्नः सैन्येन परिवेष्टितः ॥५१॥
रथाऽश्वोष्ट्रगजाक्षार्थ सुमन्त्रेण समन्वितः नानापुष्पनदीनां च जलकुभान् सहस्त्रशः । ५२॥
नानादृष्टामृत्तश्चापि शत्रुघ्नेनानयस्व हि। शोभनीया पुरी रम्या पताकाध्वजतोरणैः ॥२३॥
दत्त्वा सुधा देया तथा प्रासादमस्तके । देवालयाभ्यन्तरेऽथ चित्रशाला मनोरमाः ॥५४।
लेखनाया विधातव्या रत्नदीपाः सदैव हि। पूजोपकरणादीनि प्रतिदेवालयेष्वपि ॥५५॥
स्यापयस्व समस्तानि वायन्त्याज्ञापयस्व भोः । राजमार्गः शोधनीयाः सेचनीयाश्च चन्दनैः ॥५६॥
वीथीगोषु मयंत्र चित्राणि विविधानि च। लेखनीयानि रम्याणि मुक्ताहाराः समन्ततः ॥५७॥
प्रवालमणिवैदूर्यकाश्मीरस्फटिकादिभिः नानाविधाश्च कुसुमंहाराः पक्वफलादिभिः ॥५८॥
बधनीयाश्च सर्वत्र जालश्चैविंशेषतः। एवं यच्चन्मया प्रोक्तं तत्कुरुष्वाधिघावरतः ॥५९॥


जाकर रख आयें और अपने मित्रोंके आगे हुई विटिंवां अपना यहाँ खर्चा रह ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ आज ही रामचन्द्रजीका मुहर लगा हुआ पत्र लेकर दूत मिथिलेश जनक, काश्मौर तथा केकय आदि राजाओंके पास जायें । तदनन्तर श्याम पुच्छ तथा श्याम रेंगवाला घोडेका । ४३ । ४४ ॥ बहुमूल्य वस्त्रों और आभूषणोंसे सजाये जाय, उसे म नवां अङ्गार और वस्त्राभूषण आदि पहन पहने जाय । एक सुवर्णपत्रपर ये व से साफ़ अक्षरामे लिखकर उसके माथेपर बाँध दिया जाय-॥ ४५ । ४६ । "कौसल्यादे पह राज गगारन्दन। यह यज्ञीय घाउ भूमिपे प्रदक्षिणा करनेके लिए छोड़ा गया है। सब देश-देशान्तरके राजाओको ज्ञात हो कि जिसमें बल हो, वह इस सुन्दर घोड़ेको बाँध ले, नहीं तो अपने देशवासियां, अपनी सेना तथा कुटुम्बिदाके साथ इस प्र हक पीछे-पीछे चलता हुआ हमारी यज्ञभूमि अयोध्या अगोध्यम आकर मुझसे मिल" ॥ ४७-४९ ॥ इस आशयका पत्र लटकाया जाय । रास्तेमें जो जो उद्दण्ड राज मिले उनसे युद्ध कर-करके उन्हें परास्त कि । जाय अनेक प्रकारके झाड़-फानूस आदिस सजा करके कि सिद्धमंडप बनाया जाय । इसके अनन्तर अपनी पूरी सेनाके साथ शत्रुघ्नजी सुमन्त्रको साथ लिये हुए घोड़ेपर सवार होकर उस यज्ञीय घोड़ेकी रक्षा करनेके लिए प्रस्थान कर । उसके पश्चात् बहुत-सी पवित्र नदियोंकी मृत्तिका और हजारो घड़ोमे जल भर-भरकर शत्रुघ्नजीके द्वारा मँगाया जाय ॥ ५०-५२ ॥ अयोध्यामें जितने भी देवालय हो, उन सबको चुनेसे पुतवाया जाय । सब मकानोंकी भी सफाई की जाय । देवालयोंके भीतर नाना प्रकारके चित्रकारियों की जायँ । हर एक देवालयम हर रोज पूजन करनेकी सामग्रियाँ भेजी जायँ ॥ ५३-५५ ॥ हे लक्ष्मणजी ! आज ही आप सब प्रकारके बाज मँगाकर रखनेकी आज्ञा दे दीजिए अयोध्याके सब राजमार्ग खूब अच्छी तरह साफ किये जायें और उनपर चन्दनका छिड़काव किया जाय । राजमार्गके सब बड़े-बड़े महलोंकी दीवारोंपर विविध प्रकारके चित्र बनानेकी आज्ञा दे दी जाय । जगह जगहपर मोतियोंका मालायें लटकार्या जायं ॥ ५६ । ५७ ॥ प्रवालमणि, वैदूर्यमणि, काश्मीर और स्फटिकादि मणियांकी मालायें, फूलोंकी मालायें तथा पके फलोंकी मालाय हर एक मकानोपर लटकाई जायें । इस प्रकार मैंने जो कुछ बतलाया है, उसे कर