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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 204 of 811

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Page 204

१८८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

केचिदूचुः स्वर्णाद्रिं केचिन्प्रोद्गामुरुत्थतम् , कोऽप्यत्रिजाजातं केचित्तु प्रलयानलम् ॥१९॥
केचिन्त्याहुर्महाघोरं बाणमस्त्रं केन मोचितम् । केचित्प्रोचुः सहस्रास्यस्वरूपं फणिराजितम् ॥२०॥
एवं वदंस्तस्ते यानं ददृशुः पुष्पकं महत् । महाकोलाहलं चक्रुः प्रोचुस्स्वयं समागतः ॥२१॥
रामोऽयोध्यापतिः श्रीमान् मार्गे कर्तुं मनागर । विश्वनाथोऽपि तच्छ्रुत्वा पार्वत्या वृषमस्थितः ॥२२॥
प्रयुञ्छानं काशीस्थैः परिवेष्टितः । उपायनं राघवस्य गृहीत्वा बहुविस्तरम् ॥२३॥
एतस्मिन्नन्तरे रामस्ते देहलिविनायकम् । पूज्यं ढुंढेश्वरं दृष्ट्वा ननाम शिरसा तदा ॥२४॥
आलिङ्गितः शिवेनश्च गृहीत्वोपायनं शिवात् । स्वयं वस्त्रैराभरणैः पूजयामास शङ्करम् ॥२५॥
विवेश काशिनाथस्य धृत्वा हस्तेन मन्करम् । तावुभौ वाहनं मुक्त्वा जग्मतुर्मणिकर्णिकाम् ॥२६॥
ततः सीतापती रामश्चक्रपुष्करिणीजले । समर्प्य श्रीफलं स्नात्वा सर्चत धीरपूर्वकम् ॥२७॥
नित्ययात्रां विधायाथ कृत्वा चैकोपवेषणम् । तीर्थश्राद्धादि सग्नाय पञ्चतीर्थी विधाय च ॥२८॥
अन्तर्गृहीं महायात्रां मानसमन्दमेव च । द्विचत्वारिंशल्लिङ्गानि षड्लिङ्गानि वै ततः ॥२९॥
षट्पञ्चाशच्च गणपांस्तथाष्टौ भैरवान् पुनः । योगिनीश्च चतुःषष्टीस्तथा दुर्गाश्च वै नव ॥३०॥
तथाऽष्टादिक्पतींश्चापि तथा चैव नवग्रहान् क्षेत्रप्रदक्षिणां पञ्चक्रोशीयात्राम् रघूत्तमः ॥३१॥
चतुर्दशेमा यात्रारतु कृत्वा चैव सविस्तरम् । रामेश्वरं महालिङ्गं वरुणायास्तटे शुभे ॥३२॥
काश्या वायव्यदिग्भागे सीतया स्थाप्य चोत्तमम् । रामनाथं त्वयन्नाम्ना मार्गारब्धां चकार सः॥३३॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र वायुपुत्रः समागतः । वृत्तं श्रुत्वा राघवस्य यात्राः कर्तुं गतोऽस्त्विति ॥३४॥
सीतारामौ नमस्कृत्य स्नात्वा भगीरथे जले । स्वनाम्ना शङ्करं तीर्थमकरोद्जाह्रवीतटे ॥३५॥

लगा कि सुपने स्वर्गसे चन्द्रमाको नीचे गिरा दिया है। कोई उसको विष्णु, कोई सुमेरु पर्वत, कोई अरुन्धती तारा, कोई गरुड और कोई प्रलयाग्नि बताने लगा ॥१८-१९॥ कोई कहने लगा कि किसने महाघोर बाणयास्र छोडा है। कोई कहने लगा कि यह सहस्रमुख सर्प है॥२०॥ इस प्रकार वे सब तर्क वितर्क कर ही रहे थे कि पुष्पकविमान उनके पास आ पहुँचा। यह देखकर सब लोग कोलाहल करते हुए आश्चर्यपूर्वक एक-दूसरेसे कहने लगे कि यह तो साक्षात् अयोध्याधिपति श्रीमान् राम नगरवासियोंके साथ यहाँ यात्राके लिये पधारे हैं। यह सुनकर स्वयं काशीविश्वनाथजी बहुत-से भेंट लेकर बैलपर सवार हुए और नगरवासियोंको साथ लेकर रामके समक्ष आ उपस्थित हुए ॥२१-२३॥ इस बीच रामने देहलीविनायक तथा ढुंढिराजके दर्शन कर ही लिये । जब उन्होंने शिवजीको प्रत्यक्ष देखा तो सिर नवाकर प्रणाम किया ॥२४॥ शिवजीने रामका आलिङ्गन किया। शिवजीकी दी हुई भेंट स्वीकार करके स्वयं रामने भी वस्त्र तथा अलङ्कारसे शिवजीकी पूजा की ॥२५॥ तदनन्तर अपने हाथसे काशिनाथके सुन्दर हाथको पकड़कर रामने काशीमें प्रवेश किया। पश्चात् वे दोनों वाहन छोड़कर मणिकर्णिका गये ॥२६॥ वहाँ सीता सहित रामने और आदि करवाकर चक्रपुष्करिणी कुण्डमें श्रीफल समर्पण करके सहर्ष स्नान किया ॥२७॥ नित्ययात्रा करके एक दिनका उपवास किया। तदुपरा ब्लॉक... तीर्थश्राद्धादि कर्म करनेके बाद पञ्चतीर्थी की ॥२८॥ बादम अन्तर्गृही, महायात्रा, दोनों मानसकी यात्रा तथा बयालीस और आठ लिङ्गोंकी यात्रा की ॥२९॥ छप्पन गणपालोंकी यात्रा, आठ भैरवोंकी यात्रा, चौंसठ योगिनियोंकी यात्रा, नव दुर्गाओंकी यात्रा, ॥३०॥ आठ दिक्पालोंकी यात्रा और क्षेत्रकी प्रदक्षिणारूपिणी पञ्चक्रोशीकी यात्रा की ॥३१॥ इस प्रकार रामने उपर्युक्त चौदहों यात्राओंको विधिवत् पूर्ण किया । तदनन्तर काशीके वायव्यकोणकी सीमामें वरुणा नदीके तटपर श्रीमान् परम पवित्र तथा मनोहर रामेश्वर नामक महालिङ्ग स्थापित करके अपने नामसे भगवती भागीरथी के तटपर रामतीर्थ अर्थात् रामघाट भी स्थापित किया ॥३२॥३३॥ राम यात्रा करने निकले हैं, यह समाचार सुनकर वायुपुत्र हनुमान्जी भी वहाँ आ पहुँचे ॥३४॥ वहाँ उन्होंने सीता तथा रामको प्रणाम करके गङ्गामें स्नान किया। फिर जाह्नवीके किनारे उन्होंने