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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 203 of 811

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Page 203
सर्गः ६ ]यात्राकाण्डम्१८७

क्रोशमात्रे विमानं तन्मुक्त्वा रामः ससीतया । पद्ध्या शनैः शनैरेव त्रिवेणीमगमत्तदा ॥ २ ॥
नारिकेलं सवस्त्रेन समर्प्य रघुनंदनः चतुर्गुलमानं हि केशबन्धं सभूषणम् ॥ ३ ॥
हस्ते संछिय सीतायाः स्वयं संस्पर्शनाद्व्रतेः । लक्ष्मणस्यार्य्यसूनुश्च वपनं रघुनंदनः ॥ ४ ॥
मातृभिः कारयामास कृत्वा चैकमुपोषणम् । द्वितीये दिवसे प्राप्ते कृत्वा भ्रातृ स्तर्पणम् ॥ ५ ॥
मासमात्रं माघमासे वासं कृत्वा सविस्तरम् । प्रहतीर्थीं ततो गत्वा दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥ ६ ॥
दृष्ट्वाऽक्षयवटं रम्यं निद्रास्थानं निजाम्बये । किंचिद्धिहस्य श्रीरामः सीतया भ्रातृभिः सह ॥ ७ ॥
पूजां कृत्वा त्रिवेण्याश्च वस्त्रैर्दिव्यैः सुभूषणैः । गङ्गाजलैः कामकुम्भान् शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ८ ॥
पूरयित्वा विमानाग्र्ये स्थाप्य तीर्थं पुरोहितान् पूजयित्वा सविस्तारं नत्वा चैव पुनः पुनः ॥ ९ ॥
तान् पृष्ट्वा पुष्पके स्थित्वा वयावकाशवर्त्मना । विन्ध्याचल समाश्रित्य यत्र दुर्गा तु वर्तते ॥ १० ॥
तत्र स्नात्वा तीर्थविधि पूर्ववच्च विधाय सः । तां विन्ध्यवासिनी पूज्य वस्त्रैराभरणादिभिः ॥ ११ ॥
कृत्वा दानान्यनेकानि तोष्य तीर्थपुरोहितान् । ययौ काशीं पुष्पकस्थः श्रीरामः सीतया सुखम् ॥ १२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे दृष्ट्वा काशिस्याः पुष्पकं तु तत् । कोटिसूर्यप्रतीकाशं दृष्ट्वा पश्चिमततो दिशम् ॥ १३ ॥
यत् प्राचीं काश्याभिमुखमागच्छन्तं महोज्ज्वलम् । चक्रस्येवान्निदीर्घाश्च शतशोऽथान्तसंस्थिताः ॥ १४ ॥
केचिदूचुश्च दावाग्निस्तस्य पर्वत मस्तके सूर्य्यश्च विस्मृतः पन्था भ्रमणाद्भ्रान्तिमावमः ॥ १५ ॥
इति केचित्पुनः प्रोचुः केचिदुत्तुङ्गय मुनिः । नारदस्तु समायाति केचित्तत्र समाधिरे ॥ १६ ॥
वान्वभौ रविः स्वर्गात् केचिद्रोणाचलस्त्वितः । वायुपुत्रोऽयमिति ते प्रोचुः काशीनिवासिनः ॥ १७ ॥
केचिदूचुः शशी स्वर्गात्त्योम विनिपातितः । केचित्पुत्रश्च विप्रश्च केचित्सुः सुदर्शनम् ॥ १८ ॥

जहाँपर कि पण्डितराजका त्रिस्थली विद्यमान है ॥ १ ॥ त्रिवेणी से एक कोस दूर श्रीराम जानकीजीके साथ विमानसे उतर पड़े और धीरे धीरे पैदल ही त्रिवेणीके संगमपर गये ॥ २ ॥ वहाँ जाकर रघुनन्दनने त्रिवेणीको नारियल समर्पण करके भूषणोंसे गूँथा हुआ जानकीका केशपाश (जूड़ा) चार अँगुल लम्बा काटकर त्रिवेणीमें प्रवाहित कर दिया। पश्चात् स्वयं भी "प्रयागे मुण्डनं श्रेष्ठं" के अनुसार क्षौर करवाया। राघव उसी प्रकार माताओं, भाइयों तथा अन्यान्य सर्व-सम्बन्धियोंका भी क्षौर करवाया। तदनन्तर सबने उपवास करके दूसरे दिन तर्पण तथा श्राद्ध किया। पश्चात् यथाविधि माघ महीने-भर वहीं कल्पवास किया। उसके उपरान्त प्रयागके प्रसिद्ध त्रिवेणी, वेणीमाधव, सोमनाथ, भारद्वाज, नाग-वासुकी, अक्षयवट, रथा भ्रमर आदि तीर्थों (महातीर्थों) की यात्रा की और विप्रोंको अनेक प्रकारके दान दिये। ३-६ ॥ अपने प्रलयकालीन निद्रास्थान अक्षयवटको देखकर राम कुछ मुस्कुराये। पश्चात् सीता तथा भाइयोंके साथ मिलकर सुन्दर वस्त्रों तथा आभूषणोंसे त्रिवेणी महाराजकी पूजा की। उसके बाद हजारों कांवड़ गङ्गाजलसे भरवाकर अपने विमानपर रखवा दिये। तोषक पुरोहितोंका विस्तारसे पूजा तथा सत्कार किया। तदनन्तर उनको नमस्कार किया और उनकी आज्ञा लेकर राम विमानपर सवार हो गये। तत्पश्चात् आकाशमार्गसे विन्ध्याचल पधारे। जहाँ विन्ध्यवासिनी दुर्गाजीका दिव्य मन्दिर है ॥ ७-१० ॥ वहाँ रामने स्नान किया और पूर्ववत् वहाँपर का तीर्थविधिका पालन किया। वस्त्र तथा आभरण आदि सामग्रीसे विन्ध्यवासिनी देवीकी पूजा की ॥ ११ ॥ अनेक दान देकर वहाँके पुरोहितोंको प्रसन्न किया। पश्चात् श्रीराम सीताके साथ पुष्पक विमानपर सवार होकर सुखपूर्वक काशीको चले ॥ १२ ॥ उस समय काशीनिवासी जन उस करोंड़ों सूर्यके समान प्रकाशमान् तथा अतिउज्ज्वल विमानको पश्चिम दिशासे काशीकी ओर आते देखकर हजारोंकी संख्यामें महलोंकी छतोंपर चढ़ गये और उसके विषयमें अनेक तर्क-वितर्क करने लगे ॥ १३ ॥ १४ ॥ कोई कहने लगा कि यह पर्वतके ऊपर दावाग्नि जल रही है। कोई कहता कि सूर्य रास्ता भूलकर इधर-उधर भटक रहा है। १५ ॥ कोई कहता कि यह तो नारद मुनि आकाशसे आ रहे हैं। किसीने कहा कि स्वर्गसे सूर्य नीचे गिर रहा है। कोई कहता कि यह द्रोणाचलको लिये हनुमान्जी आ रहे हैं ॥ १६ ॥ १७ ॥ कोई कहने