अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context४३ अकबर बीरबल बिनोद
परी के देखने में लगा था। वह तत्क्षण बादशाह के मनकी
बात ताड़ गया, जल्दी में फूल और इत्र तथा गुलाबजल से
सबका स्वागतकर बोला-"गरीबपरवर ! आप और आपके
साथी मृत्यु लोक के वस्त्राभूषणों को धारण किये हुए हैं,
और ये सब नश्वर हैं, मैं सबको स्वर्गीय वस्त्र देता हूँ कृपया
उसे धारण कर इहलोक और परलोक दोनों का सुख अनु-
भव करें । ये कपड़े मैं पहले ही से अपने साथ लेता आया
हूँ और ये कभी नष्ट होने वाले भी नहीं हैं। भला बीरबल के
चकमें से कौन निकल सकता था, बादशाह के स्वीकार करते
ही सब लोग अपने कपड़े उतार २ कर अलग धर दिये
और बीरबल के दिये कपड़ों को धारण करने पर उद्यत
हुए। बीरबल कुछ सोच विचार कर बादशाह को तो असली
वस्त्र पहनाया परन्तु दीवान आदिकों को इतना ही कहकर
रह गया कि इन स्वर्गीय कपड़ों को पहन लीजिये ।
नये दीवान ने अपनी आँखों के सामने कोई वस्त्र न देख
कर मन में सोचा-"ऐसे कपड़े पहनने का अर्थ तो अपने को
नग्न करना है; परन्तु बीरबल की बात नामंजूर कर वर्णशंकर
कौन बने, इस बेइज्जती से तो नग्न होकर रहना ही अच्छा
है। उसके बदन पर केवल पाजामाशेषथा उसे भी उतार कर
अलग फेंक दिया और ऐसा ढोंग बनाया मानों लोगों के देखने
में स्वर्गीय कपड़े ही पहन रहा हो। फिर कपड़े पहने हुओं के
समान ऐँड़कर अपनी जगह पर नंग धड़ंग जा बैठा। उसके
बदन पर यदि एक लगोट न रह गया होता तो गुप्तेन्द्रियाँ
भी प्रगट दिखलाई पड़ने लगतीं। दीवान का ऐसा भेष