अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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परन्तु सभी देखनेवाले उसको नहीं देख पाते हाँ जो जन्मजा-
कुलीन और कर्म से पवित्र होते हैं वे उसे तुरत देख लेते हैं।”
बीरबल की इन बातोंसे बादशाह और घबड़ाया और मनमें
कल्पना करने लगा“—सबको तो वह स्वर्ग की परी और
उसकी दासी प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ती है और मुझे नहीं;
इसका क्या कारण है? हो न हो; मैं ही वर्णशंकर होऊँ।
अब तक मैं अपने को वर्णशंकर नहीं समझता था, परन्तु
आज इस स्वर्ग की परी के सामने परीक्षा होने पर मुझे
अपना वर्णशंकर होना निश्चित हो गया। मेरे ऐसे पतित
जीवन को कोटिशः धिक्कार है। अब मुझे इस भेद को
छिपाना आवश्यक है नहीं तो प्रजावर्ग में मेरी बड़ी अपकीर्ति
फैलेगी, मुँहपर तो सब वाह वाह करेंगे पीछे वर्णशंकर समझ
कर मेरी हँसी उड़ावेंगे। इतने में बीरबल फिर अंगुली का
संकेत करता हुआ बोला—“देखिये २ पृथ्वीनाथ ! वह चन्द्रा-
नना बैठी है और उसकी दासी बगल में खड़ी है। बादशाह
ने लाचार होकर उसकी बात मानली और बोला-“हाँ हाँ
अबकी बार वह मुझे प्रत्यक्ष दीख पड़ी। वह खिड़की में
खड़ी होकर इधर को ही देख रही है।”
बादशाह को परी का देख पड़ना स्वीकार करने पर
बीरबल सब सभासद और नये मंत्री के सहित महल के
चौथे खण्ड पर गया। वहाँ पर पहले से मुलायम कोंच और
मखमल की तकिया सुसज्जित रक्खी जा चुकी थी, बीरबल
बादशाह को कोंच पर बैठाकर उनसे गपाष्टक मारने लगा, पर
यह बात बादशाह को पसंद नहीं आती थी, उसका मन तो