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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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३१ अकबर बीरबल बिनोद
ओर उसे खूब जोतवाकर उसमें उत्तम प्रकार की खाद
डलवा दी। पंक्ति से आवपाशी कराकर उसको भली-भाँति
सिंचवा कर खेत को दुरुस्त करवा लिया। जब बीज बोने
के काबिल खेत तैयार हुआ तब बीरबल ने एक दूत द्वारा
बादशाह के पास खबर भेजी-“पृथ्वीनाथ ! आपका खेत तैयार
हो गया है अब आप सभा सदों के सहित पधार कर खेत
का मुलाहिजा फर्मावें।
बीरबल उस मोती के बीज को लेकर सभा के सम्मुख
आया और उसे बादशाह को दिखा कर बोला-“हुजूर ! इस
बीज को बोने वाला खूब पाक साफ मनुष्य होना चाहिये,
जिससे दुर्गन्धि आती होगी उसके बोने से बीज से हरगिज
मोती नहीं उगेगी। इसलिये जिसके शरीर से कभी वायु
न सरती हो वही इसको बोये। आपके दर्बार में तो ऐसों
की कमी भी नहीं है। किसी एक को आज्ञा दीजिये कि जो
इस काम को प्रसन्नता पूर्वक करे।
बादशाह ने एक एक कर अपने सभी उपस्थित सभासदों
से पूछा परन्तु कोई बीज बोनेके लिये हामी न हुआ। लगभग
हजारों की संख्या में लोग उपस्थित थे पर सभों ने नहीं
कर दिया। कारण कि यदि कोई यह कहकर कि मुझे हवा
नहीं सरती, मोती बोने का साहस करता और कहीं बाद में
मोती न उगती तो उसकी गर्दन मारी जाती।
तब बादशाह ने बीरबल को बीज बोने के लिये कहा।
बीरबल बोला-“पृथ्वीनाथ ! यह तो मैं आपसे पहले ही कह
चुका हूँ कि मुझको वायु सरती है, आपके सामने बहुतेरे