अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextअकबर बीरबल बिनोद ३०
"गरीबपरवर ! यह मोती का बीज एक बाहरी व्यापारी
लेकर आया,था जिससे मैंने बड़ी कठिनता से प्राप्त किया
है। इसमें एक खास खसूसियत यह है कि यदि कोई
पाक साफ आदमी इसको अच्छी जमीन में बोयेगा तो इसी
के समान और बहुत सी मोतियाँ पैदा होंगी । मैंने देखा
कि यह काम सिवा आपके दूसरा कोई न कर सकेगा अतएव
आपकी सेवा में लेकर उपस्थित हुआ हूँ। कृपया इसको
किसी अच्छी जमीन पर बो दीजिये, आपको आगे चलकर
इससे बड़ा लाभ होगा। बादशाह उसकी बात मानकर
तुरत आज्ञा दिया-"बीरबल ! इसके योग्य जमीन ढूँढ़कर
सूचना दो। परवाने में यह भी लिखा था कि जिस जमीन
को बीरबल इस कार्य्य के लिये पसन्द करेगा वह चाहे बड़ी
आलीशान मकानों से ही क्यों न सुशोभित की गई हो,
तुरत साफ करा दी जायगी ।
बीरबल की खूब बन आई उसने अपने पुराने बैरियों
के मकानात को आर्डर देकर तोड़वा दिया। कितने लोगों
ने तो बीरबल के आतंक से बचने के लिये बड़ी बड़ी
रकमों की घूसें दीं। पहले वह नाक भौं सिकोड़ कर
लोगों को टरकाता, परन्तु जब न मानते और बहुत मिन्नत
करते तो किसी से कम और किसी से बेस लेकर उनका
मकान छोड़ देता । जब बीरबल का खासी रकम मिल
गई तो बड़े बड़े महलों को गिरवाना बन्द कर दिया बाद
को गरीबों की झोपड़ियों का चौगुनी कीमत देकर कुछ
झोपड़ियाँ गिरवा कर एक खासी चौरस जमीन बना ली