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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 292 में से

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पृष्ठ 17
  • ॐ विष्णवे नमः *
    अकबर बीरबल-विनोद ।
    बादशाह का मूल्य ।
    अकबर बादशाह को बुद्धिमान पुरुषों से बड़ा प्रेम था ।
    यही खास कारण था जिससे उसके दरबार में नवरत्न सदैव
    विद्यमान रहते थे। एक दिन दरबार लगा हुआ था और
    बादशाह अपने राज-सम्बन्धी कार्यों को खटा-खट निपटा
    रहा था उसी के अन्तर्गत एक दरबारी बीरबल को नीचा
    दिखाने के अभिप्राय से बोला-“शाहन्शाह ! क्षमा हो
    तो गुलाम कुछ अर्ज करे।” बादशाह ने उसे बोलने
    की अनुमति दी । वह बोला “गरीब परवर ! आज मुझे
    रास्ते में एक आदमी से एक अमीर की अजब वार्ता
    सुनने में आई। वह अमीर अपने भृत्य से कह रहा था-
    “तूँ मुझे किसी काम का नहीं जान पड़ता कारण कि तूँ
    बड़ा मूर्ख है।”
    दूसरा आदमी उस अमीर का नौकर था, उससे सुनकर चुप
    न रहा गया और अपने मालिक सेठ से बड़ी विनम्रता से
    बोला-“सेठजी ! यद्यपि मैं आपका सेवक हूँ, परन्तु फिर भी