अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
DevanagariHindipublished292 पृष्ठ
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- ॐ विष्णवे नमः *
अकबर बीरबल-विनोद ।
बादशाह का मूल्य ।
अकबर बादशाह को बुद्धिमान पुरुषों से बड़ा प्रेम था ।
यही खास कारण था जिससे उसके दरबार में नवरत्न सदैव
विद्यमान रहते थे। एक दिन दरबार लगा हुआ था और
बादशाह अपने राज-सम्बन्धी कार्यों को खटा-खट निपटा
रहा था उसी के अन्तर्गत एक दरबारी बीरबल को नीचा
दिखाने के अभिप्राय से बोला-“शाहन्शाह ! क्षमा हो
तो गुलाम कुछ अर्ज करे।” बादशाह ने उसे बोलने
की अनुमति दी । वह बोला “गरीब परवर ! आज मुझे
रास्ते में एक आदमी से एक अमीर की अजब वार्ता
सुनने में आई। वह अमीर अपने भृत्य से कह रहा था-
“तूँ मुझे किसी काम का नहीं जान पड़ता कारण कि तूँ
बड़ा मूर्ख है।”
दूसरा आदमी उस अमीर का नौकर था, उससे सुनकर चुप
न रहा गया और अपने मालिक सेठ से बड़ी विनम्रता से
बोला-“सेठजी ! यद्यपि मैं आपका सेवक हूँ, परन्तु फिर भी