अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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अकबर बीरबल विनोद
जीवों की रचना करने का विचार कर मनुष्यों की रचना
की। तब वह अति आनन्दित होकर पहले उसे रूप, दूसरे
धन, तीसरे बुद्धि और चौथे बल प्रदान किया ।
चारों चीजों को जुदी २ रखकर सब मनुष्यों को फर्माया
कि इन चारों में जिसे जो पसन्द हो अपनी इच्छानुसार ले लेवे।
इस कार्य के लिये कुछ समय भी निर्धारित कर दिया था। मैं
बुद्धि लेने में रह गया जब दूसरो चीज लेने गया तो समय
बीत चुका था इसलिये कोरा लौटना पड़ा। मैं बुद्धि लेकर रह
गया। आप लोग भी धन, रूप, बल के लालच में पड़कर बुद्धि
लेना भूल गये। इसी कारण मैं कुरूप हुआ। बीरबल के उत्तर
से बादशाह और दरबारियों का मन टूट गया और फिर
वे कभी बीरबल की हँसी न उड़ाई ।
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चतुर माँ के सपूत
एक दिन बादशाह बीरबल के साथ बाग में बैठा हुआ
गपाष्टक कर रहा था। गरमी का दिन था। प्रातःकाल की मन्द
मन्द हवा बह रही थी। बादशाह और दीवान गरमी की
पोशाक पहने हुए थे। उस सुहावने समय में वे बड़े खुश
मालूम होते थे। उनके बातों की लड़ी टूटती ही न थी। प्रसंग
चलते २ बनियों का जिक्र आया। बादशाह ने बीरबल से पूछा-
“बीरबल ! क्या यह सच है, लोग अक्सर बनियों को चतुर माँ के
बेटे क्यों कहते हैं ?” बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथ्वीनाथ !
सचमुच बनिये ऐसे ही पाये जाते हैं।” बादशाह ने कहा-“अच्छी
बात है; परन्तु इसका प्रमाण देकर मेरी शंका निवारण करो।