ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
ब्राह्मण कही जा चुकी (४।२०)। जिसको पशु की कामना हो
चौथा अध्याय ] ३९१
यजमान के लिये इनको इसी प्रकार पढ़ा था। उसने कहा था,
'मैंने यजमान के लिये बहुत पशु पकड़ लिये। बहुत अच्छे
मुझे मिलेंगे।' उसने उसको इतनी ही दक्षिणा दी जितनी
बड़े २ ऋत्विजों को दी गई। इस शस्त्र से पशु और स्वर्ग की
प्राप्ति होती है। इसलिये इसका पाठ किया जाता है ।(८)
२५-अब दुरोहण का पाठ करता है। इसके लिये एक
ब्राह्मण कही जा चुकी (४।२०)। जिसको पशु की कामना हो
वह इन्द्र का सूक्त पढ़े। क्योंकि पशु इन्द्र के हैं। यह जगती
छन्द में हो, क्योंकि पशु जागत (चलने वाले) हैं। यह महा-
सूक्त होना चाहिये जिससे यजमान को बहुत से पशु मिल
जायें। वरु ऋषि का सूक्त पढ़े (१०।९६ प्रतेमहे)। यह महा
सूक्त भी है और जगती छन्द में भी है।
प्रतिष्ठा की कामना हो तो इन्द्र वरुण का सूक्त पढ़े।
क्योंकि यह होत्र उसी देवता का है। यह इन्द्र वरुण की
प्रतिष्ठा है। यह जो इन्द्र-वरुण का याज्य है वह उसी अपनी
ही प्रतिष्ठा में स्थित है। यह इन्द्र-वरुण का सूक्त निविद् के
समान है इससे कामनायें पूरी हो जाती हैं। जब इन्द्र-वरुण
का सूक्त दुरोहण के लिये चुने तो सुपर्ण ऋषि का चुने
(८।३९ इमानि वां भागधेयानि...)। इससे इन्द्र-वरुण तथा
सुपर्ण सम्बन्धी कामना एक साथ पूरी हो सकती है ।(९)
२६-प्रश्न होता है कि दुरोहण के साथ छठे दिन के
अहीन सूक्त पढ़े या न पढ़े ? इसका उत्तर यह है कि अवश्य
पढ़े। जब और दिन पढ़ता है तो आज क्यों न पढ़े !
कुछ लोग कहते हैं कि न पढ़े। छठा दिन स्वर्ग लोक है।
स्वर्ग लोक असमायी है अर्थात् सब इस को प्राप्त नहीं कर
सकते (inaccessible)। स्वर्ग लोक में कोई विरला ही
पहुँचता है। अगर दुरोहण के साथ में और सूक्त भी पढ़े
३९२ [छठी पञ्चिका
जायँगे तो सभी बराबर हो जायँगे । स्वर्ग लोक की विशेषता
यह है कि दुरोहण के साथ अन्य सूक्त न पढ़े जायँ । इस
लिये न पढ़े।' इसीलिये नहीं पढ़ता । स्तोत्रिय आत्मा हैं और
वालखिल्य प्राण हैं । जब अहीन सूक्तों का दुरोहण के साथ
पाठ करता है तो इन दो देवतों के द्वारा यजमान के प्राण ले
लेता है। जब किसी होत्रक को ऐसा करते देखे तो कहे कि
तू ने इन दो देवताओं के द्वारा यजमान के प्राण ले लिये ।
और वह मर जायगा । सदा ऐसा ही होता है । इस लिये
न पढ़े ।
अगर मैत्रावरुण सोचे कि मैंने वालखिल्य का पाठ कर
लिया, अब मैं दुरोहण के पूर्व एकाह सूक्त पढूँ, उसे ऐसा न
करना चाहिये। लेकिन अगर घमंड में आकर कहे कि दुरोहण
के पीछे बहुत सैकड़ों सूक्त पढ लूँ गा तो इस कामना की पूर्ति
के लिये पढ़ ले। परन्तु न पढ़ना अच्छा है। वालखिल्य इन्द्र
के हैं। उनमें बारह अक्षरों के पद होते हैं। और जगती छन्द
के इन्द्र के सूक्त से जो कामना पूरी हो सकती है वह इनसे
भी पूरी हो सकती है ।
न पढने के लिये एक हेतु यह है कि यह इन्द्र-वरुण के
सूक्त हैं। और इन्द्र-वरुण के याज्य से ही यज्ञ की समाप्ति
होती हैं।
कहते हैं कि जैसा स्तोत्र हो वैसा शस्त्र हो । प्रश्न यह है
कि क्या विहार युक्त (मिले हुये) वालखिल्यों की गणना
ऐसे स्तोत्रों में है या बिना मिले हुये (अविहृत) की ? इसका
उत्तर है कि विहृत सूक्तों की है । बारह अक्षरों का पद आठ
अक्षरों के पद से मिल जाता है ।
कहते हैं कि जैसा याज्य हो वैसा शस्त्र हो । अगर शस्त्र में
तीन देवता हों अर्थात् अग्नि, इन्द्र और वरुण तो केवल इन्द्र-
चौथा अध्याय ] ३९३
वरुण का याज्य कैसे पढ़े, अग्नि को कैसे छोड़ दे ? इसका उत्तर
यह है कि अग्नि और वरुण तो एक ही हैं। ऋषि भी यही
कहता है :—
त्वमग्ने वरुणो जायसे ( ५।३।१ )
इसलिये इन्द्र और वरुण के याज्य में अग्नि छूटता नहीं । (१०)
ऐतरेय ब्राह्मण की छठी पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त हुआ ।
पाँचवाँ अध्याय
२७—शिल्पसूक्तों को पढ़ते हैं। देव-शिल्प बहुत से हैं।
और यह जो मानवी शिल्प है वह देव-शिल्पों की अनुकृति है।
हाथी की सुनहरी झूलें और घोड़ों के रथ यह सब शिल्प हैं।
जो इस रहस्य को समझता है वह शिल्प को जान सकता है।
शिल्पों से आत्मा का संस्कार होता है और आत्मा छन्दोमय
हो जाती है। होत्रक इनसे यजमान की आत्मा का संस्कार कर
देता है।
नाभानेदिष्ठ को पढ़ता है। नाभानेदिष्ठ वीर्य है। इस
प्रकार वह वीर्य को सींचता है। यह अनिरुक्त पढ़ा जाता है
(अर्थात् नाभानेदिष्ठ का मंत्र में नाम नहीं होता) क्योंकि
वीर्य का नाम नहीं लेते। उसे गुप्त रीति से योनि में डाल
देते हैं। वह वीर्य मिश्रित हो जाता है। (जब प्रजापति ने
पुत्रों के साथ समागम किया) तब वह वीर्य जमीन पर गिर
गया। सन्तानोत्पत्ति के लिये। (ऋ० १०।६१।६)
अब नराशंस को पढ़ता है। 'नर' का अर्थ है 'प्रजा', 'शंस'
( ३९४ )
पाँचवाँ अध्याय ] ३९५
का अर्थ है 'वाक्' । इस प्रकार सन्तान में वाणी को रखता है ।
इस प्रकार बोलने वाली सन्तान उत्पन्न होती है ।
कुछ लोग नाराशंस को नाभानेदिष्ठ से पहले बोलते हैं
क्योंकि जबान आगे है। कुछ पीछे क्योंकि जबान पिछले भाग
में है। मध्य में बोले क्योंकि वाणी मध्य में है। चूँकि वाणी
नाभानेदिष्ठ के अगले भाग के निकटतम है अतः नाराशंस को
नाभानेदिष्ठ के समाप्त होने से पहले पढ़ना चाहिये ।
होता यजमान को वीर्य के रूप में मैत्रावरुण को दे देता
है। यह कहकर "तू इसका प्राण बना” । (१)
२८—अब वह वालखिल्य पढ़ता है। वालखिल्य प्राण हैं।
इस प्रकार वह यजमान के प्राण बनाता है। वह वालखिल्य
को विहृत दशा में पढ़ता है (अर्थात् एक मन्त्र के एक भाग से
मिलाकर)। क्योंकि यह प्राण मिले हुये हैं, प्राण अपान से
और अपान व्यान से । पहले दो सूक्तों में पद-वार मिलाता
है। दूसरे दो में आधी आधी ऋचा करके। और तीसरे दो
में मंत्र-वार ।
पहले सूक्त में जो मिलाता है सो प्राण और वाणी को
मिलाता है। दूसरे में चक्षु और मन को । तीसरे में कान और
आत्मा को ।
कुछ लोग वालखिल्य पढ़ते हुये दो बृहती और दो सतो-
बृहती को मिलाते हैं। इससे इच्छा तो पूरी हो जाती है परन्तु
प्रगाथ नहीं बनते । एक पद अधिक मिला कर पढ़े तो प्रगाथ
बन जाते हैं। वालखिल्य प्रगाथ हैं। इस लिये एक पद मिला
कर पढ़े ।
बृहती आत्मा है और सतोबृहती प्राण । बृहती के पढ़ने से
आत्मा बनता है और सतोबृहती से प्राण । इस प्रकार बृहती
और सतोबृहती के पढ़ने से आत्मा को प्राणों से युक्त करता