अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)
Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)
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About this granth
The Adbhut Ramayana (अद्भुत रामायण) is a Sanskrit retelling of the Rama story traditionally ascribed to Valmiki. Its most distinctive feature is its picture of Sita: after the ten-headed Ravana is killed, a thousand-headed Ravana appears, and it is Sita, taking the fierce form of Kali, who destroys him. For this reason the work is also read within the Shakta tradition.
The text is divided into sargas, and in this edition each sarga is printed with a Hindi tika beneath the Sanskrit verses. A short introduction, opening with a doha, makes the point that the story of Rama is endless and is told differently in different works.
The Hindi commentary is by Vidyavaridhi Pandit Jwala Prasad Mishra, a prolific translator of Sanskrit texts around the turn of the twentieth century. This copy was printed by Khemraj Shrikrishnadas at the Shri Venkateshwar Steam Press, Bombay, in Samvat 2019 (1962), and comes from the Chambal Archives, Etawah. It has 173 pages.
(६०) अद्भुतरामायण [ दशम -
आत्मानं दर्शयामास हनूमान्रामलक्ष्मणौ । को भवानिति
चोक्तेऽथ चतुर्बाहुं किरीटिनम् ॥ ११ ॥ शंखचक्रगदापाणिं वनमाला-
विभूषितम् । श्रीवत्सबक्षसं देवं पीतवाससमच्युतम् ॥ १२ ॥
वालीके भयसे रहता था, उसने रामलक्ष्मणको देखा, वह वीर चाप धारण किये आकाशसे ग्रसते हुएके समान थे ॥ ९ ॥ उनको देखकर सुग्रीव बडे त्रासको प्राप्त हुआ, कारण कि, उनको वालीके पक्षका जाना, तब भिक्षुरूपसे महावीरको उनके निकट भेजा ॥ १० ॥ हनुमान्ने रामलक्ष्मणको अपना स्वरूप दिखाया, आप कौन हो इस प्रकार चतुर्बाहु किरीटधारी ॥ ११ ॥ शंख, चक्र, गदापाणि वन मालासे विभूषित श्रीवत्स वक्षस्थलमें धारण किये, पीतवस्त्रधारी अच्युत ॥ १२ ॥
लक्ष्मीसरस्वतीभ्यां च संश्रितोभयपार्श्वकम् । ब्रह्मपुत्रैः सनन्दाद्यैः
स्तूयमानं समन्ततः ॥ १३ ॥ देवर्षिपितृगंधर्वैः सिद्धविद्याधरोरगैः ।
सेव्यमानं महात्मानं पुंडरीकविलोचनम् ॥ १४ ॥
लक्ष्मी सरस्वतीसे सेवित ब्रह्माके पुत्र सनन्दादिसे सब ओर सेव्यमान ॥ १३ ॥ देवता पितर गन्धर्व सिद्धविद्याधर उरग महात्माओंसे सेवित कमललोचन ॥ १४ ॥
सहस्र सूर्यसंकाशं शतचन्द्रशुभाननम् । फणासहस्रमतुलं धारयन्तं
च लक्ष्मणम् ॥ १५ ॥ अनन्तं रामशिरसि आतपत्रं फणागणैः ।
दधानं सर्वलोकेशनागसंघैश्च संस्तुतम् ॥ १६ ॥
सहस्रसूर्यके समान प्रकाशमान, सौ चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाले सहस्र फण धारण किये लक्ष्मणको ॥ १५ ॥ जो अनन्त हैं और रघुनाथजीके शिरपर अपने फणोंका छत्र धारण किये हैं वे सर्वलोकेश नागसमूहोंसे स्तुति किये हुए हैं ॥ १६ ॥
आत्मानं दर्शयामास रामचन्द्रो हनूमते । तद्रूपं हनूमन्वीक्ष्य
किमेतदिति विस्मितः ॥ १७ ॥ क्षणं निमील्य नयने पुनः सोऽपश्यद-
द्भुतम् । स्तुत्वा नत्वा च बहुधा सोऽब्रवीद्राघवं वचः ॥ १८ ॥
इस प्रकार रामचन्द्रने महावीरजीके प्रति अपनी आत्माको दिखाया महावीरजी उस रूपको देख यह क्या है इस प्रकार विस्मित हो गये ॥ १७ ॥ क्षणमात्रको नेत्र मीचकर फिर वह अद्भुत रूप देखते हुए और अनेक प्रकारकी स्तुति और प्रणाम कर रामचन्द्रसे कहने लगे ॥ १८ ॥
सर्ग हिन्दीटीकासहित (६१)
सर्ग हिन्दीटीकासहित (६१)
अहं सुग्रीवसचिवो हनुमान्नाम वानरः । सुग्रीवेण प्रेषितोऽहंयुवां कौ ज्ञातुमागतः ॥ १९ ॥
दृष्ट्वा युवां च द्विभुजौ चापबाणधरौ परम् । आगत्य चान्यथा दृष्टं वद मे को भवानिति ॥ २० ॥
में सुग्रीवका मंत्री हनुमान् नाम वानर हूँ, सुग्रीवने भेजा है देखियो कि, यह कौन हैं ? ॥ १९ ॥ आपको धनुषबाण धारण किया देखकर अगर कुछ और ही प्रकारसे देखा, कहिये आप कौन हैं। ॥ २० ॥
इति पवनसुतं तं व्याकुलं व्याहरन्तं किमिति कथमितीदं कंपमानं प्लवंगम्।।
कृतकरपुटमौलिं संविधेयं ब्रुवन्तं मधुरतर मुदारं रामचन्द्रोऽब्रवीत्तम् ॥ २१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदि काव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे श्रीराम-चतुर्भुजरूपदर्शनं नाम दशमः सर्गः ॥ १० ॥
इस प्रकार व्याकुलतासे कहते महावीरके वचन सुन यह क्या है इस प्रकार कहकर कंपित होते हुए और हाथ जोडकर शिर झुकाये वचन कहते महावीर-वीरजीसे उदारतापूर्वक रामचन्द्र बोले ॥ २१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रा. अ. भाषाटीकायां चतुर्भुजरूपदर्शनं नाम दशमः सर्गः ॥ १० ॥
एकादश सर्ग
रामका सांख्ययोग वर्णन करना
रामःप्राह हनूमन्तमात्मानं पुरुषोत्तमः ॥
वत्स वत्स हनूमंस्त्वं भक्तोयत्पृष्टवानसि ॥ १ ॥
तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि शृणुष्वावहितो मम ॥
अवाच्यमेतद्विज्ञानमात्मगुह्यं सनातनम् ॥ २ ॥
पुरुषोत्तम राम हनुमान्से अपना वर्णन करने लगे, हे वत्स हनुमान् ! हमारे भक्त तुम जो हमसे पूछते हो ॥ १ ॥ सो मैं कहता हूँ तुम सावधान होकर सुनो यह आत्मगुह्य सनातन ज्ञान किसीसे कहना नहीं चाहिये ॥ २ ॥
यन्न देवा विजानंति यतन्तोऽपि द्विजातयः ॥
इदं ज्ञानं समाश्रित्य ब्रह्मभूताद्विजोत्तमाः ॥ ३ ॥
न संसारं प्रपश्यंति पूर्वेऽपि ब्रह्मवादिनः ॥
गुह्याद्गुह्यतमं साक्षाद्गोपनीयं प्रयत्नतः ॥ ४ ॥
५ (६२) अद्भुतरामायण [ एकादश-
जिसको यत्न करनेपर देवता और द्विजातिभी नहीं जानते हैं, इस ज्ञानको प्राप्त द्विजोत्तम ब्रह्ममय हो जाते हैं ॥ ३ ॥ इसके द्वारा पूर्वब्रह्मवादी भी संसारको नहीं देखते हैं यह गुप्तसे गुप्त छिपा रखनेके योग्य है ॥ ४ ॥
वंशे भक्तिमतो ह्यस्य भवंति ब्रह्मवादिनः ॥ आत्मा यः केवलः स्वच्छः शांतः सूक्ष्मः सनातनः ॥ ५ ॥ अस्ति सर्वान्तरः साक्षाच्चिन्मात्रस्तमसः परः ॥ सोऽन्तर्यामी स पुरुषः स प्राणः स महेश्वरः ॥ ६ ॥
जो जानता है उसके वंशमें महात्मा और ब्रह्मवादी होते हैं, आत्मा केवल स्वच्छ शान्त सूक्ष्म सनातन है ॥ ५ ॥ वह सर्वान्तर साक्षात् चिन्मात्र अन्धकार से परे है, वही अन्तर्यामी पुरुष प्राण और महेश्वर है ॥ ६ ॥
स कालाग्निस्तदव्यक्तं सद्यो वेदयति श्रुतिः ॥ कस्माद्विजायते विश्वमत्रैव प्रविलीयते ॥ ७ ॥ मायावी मायया बद्धः करोति विविधास्तनूः ॥ न चाप्ययं संसरति नच संसारयेत्प्रभुः ॥ ८ ॥
वही कालाग्नि अव्यक्त है यह वेदश्रुति कहती है, इससे संसार उत्पन्न होकर इसीमें लय हो जाता है ॥ ७ ॥ वही मायावी मायासे बद्ध होकर अनेक शरीर धारण करता है, न कोई इसे चला सकता है न यह चलता है ॥ ८ ॥
नायं पृथ्वी न सलिलं न तेजः पवनो नभः ॥ न प्राणो न मनो व्यक्तं न शब्दः स्पर्श एव च ॥ ९ ॥ न रूपरसगन्धश्च नाहङ्कर्ता न वागपि ॥ न पाणिपादौ नो पायुर्न चोपस्थं प्लवंगम ॥ १० ॥
न यह पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश प्राण मन अव्यक्त शब्द स्पर्श है ॥ ९ ॥ न रूप रस गन्ध और न अहंकार न वाणी है, हे महावीर ! कर चरण उपस्थ पायुरूप भी नहीं है ॥ १० ॥
न कर्ता न च भोक्ता च न प्रकृतिपूरुषौ ॥ न माया नैव च प्राणश्चैतन्यं परमार्थतः ॥ ११ ॥ तथा प्रकाशतमसोः सम्बन्धोनोपपद्यते ॥ तद्वदेव न सम्बंधः प्रपञ्चपरमात्मनोः ॥ १२ ॥
कर्त्ता भोक्ता प्रकृति पुरुष माया प्राण भी नहीं है, केवल चैतन्य स्वरूप है ॥ ११ ॥ जिस प्रकार प्रकाश और अन्धकारका सम्बन्ध नहीं है इसी प्रकार प्रपंचसे परमात्माका कुछ सम्बन्ध नहीं है ॥ १२ ॥
छायातरू यथा लोके परस्परविलक्षणौ ॥ तद्वत्प्रपंचपुरुषौ विभिन्नौ परमार्थतः ॥ १३ ॥ यद्यात्मा मालिनोऽस्वस्थो विकारी स्यात्स्वभावतः । नहि तस्य भवेन्मुक्तिर्जन्मांतरशतैरपि ॥ १४ ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (६३)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (६३)
जैसे लोकमें छाया और वृक्ष परस्पर विलक्षण हैं इसी प्रकार प्रपंच और पुरुष परमार्थसे भिन्न हैं ॥ १३ ॥ जो आत्माकी मलिन अवस्था है जो स्वभावसे विकारी हो तो सौ जन्ममें भी मुक्ति नहीं हो सकती ॥ १४ ॥
पश्यंति मुनयो मुक्ताः स्वात्मानं परमार्थतः । विकारहीनं निर्दुःखमानंदात्मानमव्ययम् ॥ १५ ॥ अहं कर्ता सुखी दुःखी कृशः स्थूलेति या मतिः । साप्यहंकृतिसम्बन्धादात्मन्यारोप्यते जनैः । १६ ।
मुनिजन परमार्थसे अपने आत्माको मुक्त देखते हैं, विकारहीन दुःखरहित आनंद अविनाशी देखते हैं ॥ १५ ॥ मैं कर्ता सुखी दुखी हूं, स्थूल कृश हूँ, यह बुद्धि अहंकारके सम्बंधसे प्राणी आत्मामें आरोपण करते हैं ॥ १६ ॥
वदंति वेद विद्वांसः साक्षिणं प्रकृतेः परम्। भोक्तारमक्षयं बुद्ध्वा सर्वत्र समवस्थितम् ॥ १७ ॥ तस्मादज्ञान मूलोयं संसारः सर्व देहिनाम् । अज्ञानादन्यथा ज्ञातं तच्च प्रकृतिसङ्गतम् ॥ १८ ॥
वेदके जाननेवाले उसको प्रकृतिसे परे कहते हैं, वही भोक्ता अक्षय सर्वत्र स्थित है ॥ १७ ॥ इस कारण सब देहधारियोंको यह संसार अज्ञानसे प्रतीत होता है, ज्ञानसे अन्यथा दीखता है और वहभी प्रकृतिसे संगसे ऐसा है ॥ १८ ॥
नित्योदितः स्वयंज्योतिः सर्वगः पुरुषः परः । अहं काराविवेकेन कर्ताहमिति मन्यते ॥ १९ ॥ पश्यंति ऋषयो व्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् । प्रधानं प्रकृतिं बुद्ध्वा कारणं ब्रह्मवादिनः ॥ २० ॥
वह सर्वांतर्यामी पुरुष नित्य उदित स्वयं ज्योति सर्वगामी पुरुष पर है, उसके विना जाने यह पुरुष अहंकारके विवेक करनेसे अपने आपको कर्ता मानता है ॥ १९ ॥ ऋषिजन उस सदात्मक सर्वगामी चैतन्यको यथार्थ देखते हैं, ब्रह्मवादी उस प्रधान प्रकृति कारण ब्रह्मको जानकर मुक्त होते हैं २०
तेनात्र सङ्गतो ह्यात्मा कूटस्थोऽपि निरंजनः । आत्मानमक्षरं ब्रह्म नावबुद्ध्यंति तत्त्वतः ॥ २१ ॥ अनात्मन्यात्मविज्ञानांतस्माद्दुखं तथेतरत् । रागद्वेषादयो दोषाः सर्वभ्रांतिनिबंधनाः ॥ २२ ॥
उससे संगतिको प्राप्त हुआ कूटस्थ निरंजन पुरुष तत्त्वसे अक्षर ब्रह्मरूप अपने आत्माको नहीं जानता है ॥ २१ ॥ अनात्मामें आत्माको जानकर दुःखी होता है, राग द्वेषादि यह सब भ्रांतिके निबंधन हैं ॥ २२ ॥
(६४) अद्भुतरामायण एकादश-
कार्य्ये ह्यस्य भवेदेषा पुण्यापुण्यमिति श्रुतिः । तद्वशादेव सर्वेषां सर्वदेहसमुद्भवः ॥ २३ ॥ नित्यः सर्वत्रगो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जितः । एकः स भिद्यते शक्त्या मायया न स्वभावतः ॥ २४ ॥
इसी कार्यमें यह पुण्य अपुण्य देखा जाता है ऐसी श्रुति है, इसीके वशसे सब देहधारियोंके देहकी उत्पत्ति है ॥ २३ ॥ आत्मा नित्य और सर्वत्रगामी है, कूटस्थ दोषसे वर्जित एकही वह अपने मायास्वभावसे अनेक प्रकारका दीखता है ॥ २४ ॥
तस्मादद्वैतमेवाहुर्मुनयः परमार्थतः । भेदोऽव्यक्तस्वभावेन सा च मायात्मसंश्रया ॥ २५ ॥ यथा हि धूमसंपर्कान्नाकाशो मलिनो भवेत् । अंतःकरणजैर्भावैरात्मा तद्वन्नलिप्यते ॥ २६ ॥
इस कारणसे मुनिजन परमार्थसे अद्वैतही कहते हैं, स्वभावसे जो अव्यक्तका भेद है वह माया है ॥ २५ ॥ जैसे धूमके सम्पर्कसे आकाशमें श्यामता दीखती है, आकाशमें दोष नहीं आता इसी प्रकार अन्तःकरणके भावोंमें आत्मा मलिन नहीं होता है ॥ २६ ॥
यथा स्वप्रभया भाति केवलः स्फटिकोपलः । उपाधिहीनो विमलस्तथैवात्मा प्रकाशते ॥ २७ ॥ ज्ञानस्वरूपमेवाहुर्जगदेतद्विचक्षणाः । अर्थस्वरूपमेवाज्ञाः पश्यन्त्यन्ये कुबुद्धयः ॥ २८ ॥
जैसे स्फटिक मणी केवल अपनी कांतिसेही शोभाको प्राप्त होती है उपाधिहीन होनेसे निर्मल है उसी प्रकार आत्मा प्रकाशित होता है ॥ २७ ॥ बुद्धिमान् इस जगत्को ज्ञानरूप कहते हैं, कुबुद्धि अज्ञानी इसको अर्थस्वरूप देखते हैं ॥ २८ ॥
कूटस्थो निर्गुणो व्यापी चैतन्यात्मा स्वभावतः । दृश्यते ह्यर्थरूपेण पुरुषैर्भ्रान्तदृष्टिभिः ॥ २९ ॥ यथा संलक्ष्यते व्यक्तः केवलः स्फटिको जनैः । रक्तिकाव्यवधानेन तद्वत्परम पूरुषः ॥ ३० ॥
वह कूटस्थ निर्गुण व्यापी आत्मा स्वभावसे चैतन्य है, भ्रांति दृष्टिवाले पुरुषोंको यह अर्थरूप दीखता है ॥ २९ ॥ जैसे मनुष्योंको केवल स्फटिक प्रत्यक्ष दीखता है और व्यवधानसहित होनेसे लालिमा आदि दीखती है इसी प्रकार परम पुरुष है पृथक् शुद्ध है देहमें व्याप्त होनेसे उपाधिमान् दीखता है ॥ ३० ॥
सर्ग १] हिन्दीटीकासहित (६५)
सर्ग १] हिन्दीटीकासहित (६५)
तस्मादात्माक्षरः शुद्धो नित्यः सर्वगतो ऽव्ययः ।। उपासितव्यो
मंतव्यः श्रोतव्यश्च मुमुक्षुभिः ।। ३१ ।। यदा मनसि चैतन्यं भाति
सर्वत्रगं सदा ।। योगिनोऽव्यवधानेन तदा संपद्यते स्वयम् ।। ३२ ।।
इस कारण आत्मा अक्षर शुद्ध नित्य सर्वतक अविनाशी है वही उपासना
करने योग्य मानने योग्य और मुमुक्षुओंके सुनने योग्य है ।।३१।। जिस समय
मनमें सर्वगामी चैतन्यका प्रादुर्भाव होता है तब योगी व्यवधानरहित हो
उसको प्रोप्त होता है ।। ३२ ।।
यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभि पश्यति ।। सर्वभूतेषु चात्मानं
ब्रह्म संपद्यते स्वयम् ।। ३३ ।। यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येव न
पश्यति ।। एकीभूतः परेणासौ तदा भवति केवलः ।। ३४ ।।
जिस समय सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनी आत्मामें देखता है और अपनेको
सब भूतोंमें देखता है तब उस ब्रह्मको प्राप्त होता है।।३३।। जो सब भूतोंको
अपनेमें देखता है तब यह एक एकीभूत केवल ब्रह्मको प्राप्त होता है ।। ३४ ।।
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते काया येऽस्य हृदि स्थिताः ।। तदासाव-
मृतीभूतः क्षेमं गच्छति पंडितः ।। ३५ ।। यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनु
पश्यति ।। तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ।। ३६ ।।
जब इसके हृदयकी सब कामना छूट जाती है तब यह पंडित अमृतीभूत
होकर क्षेमको प्राप्त होता है ।। ३५ ।। भूतोंको पृथग्भावको एक स्थानमें
देखता है उसी समय ब्रह्मविचारके विस्तारको प्राप्त होता है ।। ३६ ।।
यदा पश्यति चात्मानं केवलं परमार्थतः ।। मायामात्रं जगत्कृत्स्नं
तदा भवति निर्वृतः ।। ३७ ।। यदा जन्मजरादुःखव्याधीनामेकभेष-
जम् ।। केवलं ब्रह्मविज्ञानं जायतेऽसौ तदा शिवः ।। ३८ ।।
जब परमार्थसे अपनेको केवल एक देखता है और जगत्को माया मात्र
देखता है तब निर्वृति हो जाती है ।। ३७ ।। जिस समय जन्म जरा दुःख
व्याधियोंको एक ही औषधी केवल ब्रह्मज्ञान होता है तब यह शिव होता है ३८
यथा नदी नदा लोके सागरेणैकतां ययुः ।। तद्वदात्माक्षरेणासौ
निष्कलेनैकतां व्रजेत् ।। ३९ ।। तस्माद्विज्ञानमेवास्ति न प्रपञ्चो न
संस्थितिः ।। अज्ञानेनावृतं लोके विज्ञानं तेन मुह्यति ।। ४० ।।
५
(६६) अद्भुतरामायण [एकादश-
जैसे नदी नद समुद्रमें जाकर एकताको प्राप्त होते हैं इसी प्रकारसे यह निष्कल आत्मा अक्षरमें मिलकर एकताको प्राप्त होता है ॥ ३९ ॥ इस प्रकारसे विज्ञानही है प्रपंच और स्थिति नहीं है, लोक अज्ञानसे व्याकुल होकर विज्ञानसे देखता है ॥ ४० ॥
तज्ज्ञानं निर्मलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं यदव्ययम् ॥ अज्ञानमिति तत्सर्वं विज्ञानमिति मे मतम् ॥ ४१ ॥ एतत्ते परमं सांख्यं भाषितं ज्ञानमुत्तमम् । सर्ववेदान्तसारं हि योगस्तत्रैक चित्तता ॥ ४२ ॥
वह ज्ञान निर्मल सूक्ष्म निर्विकल्प अविनाशी है, यह अज्ञानसे सब होता है विज्ञान है वही सर्व श्रेष्ठ है एक यही निश्चय है ॥ ४१ ॥ यह परम सांख्य उत्तम ज्ञान है, सब वेदान्तका सारयोग वही है कि एकचित्तता होनी ॥ ४२ ॥
योगात्संजायते ज्ञानं ज्ञानाद्योगः प्रजायते । योगज्ञानाभियुक्तस्य नावाप्यं विद्यते क्वचित् ॥ ४३ ॥ यदेव योगिनो यांति सांख्यं तदभिगम्यते । एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स तत्त्ववित् ॥ ४४ ॥
योगसे ज्ञान होता है ज्ञानसे योग प्रवृत्त होता है, ज्ञानयोगसे युक्त पुरुषोंको कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ४३ ॥ जिस मार्गसे योगी चलते हैं उसी मार्गसे सांख्यवाले जाते हैं, सांख्य योगसे जो एकता देखता है वही देखता है ॥ ४४ ॥
अन्ये च योगिनो वत्स ऐश्वर्यासक्तचेतसः । मज्जन्ति तत्र तत्रैव सत्त्वात्मैक्यमिति श्रुतिः ॥ ४५ ॥ यत्तत्सर्वगतं दिव्यमैश्वर्यमचलं महत् । ज्ञानयोगाभियुक्तस्तु देहांते तदवाप्नुयात् ॥ ४६ ॥
हे वत्स ! ऐश्वर्यमें मन लगानेवाले योगी और हैं वे उन स्थानों में निमज्जित होते हैं, सत्त्वात्मा एक है यह श्रुति है ॥ ४५ ॥ जो सर्वगत दिव्य अचल ऐश्वर्य है ज्ञानयोगमें युक्त प्राणी उस सबको देहान्तमें प्राप्त हो जाते हैं ॥ ४६ ॥
एष आत्माहमव्यक्तो मायावी परमेश्वरः । कीर्तितः सर्ववेदेषु सर्वात्मा सर्वतोमुखः ॥ ४७ ॥ सर्वकामः सर्वरसः सर्वगंधोऽजरोमरः । सर्वतः पाणिपादोऽहमंतर्यामी सनातनः ॥ ४८ ॥
यह मैं अव्यक्त आत्मा मानवी परमेश्वर हूँ सब वेदोंमें सर्वात्मा सर्वतोमुख स्थित हो रहा हूँ ॥ ४७ ॥ सर्वकामयुक्त सर्वरस, सर्वगन्ध अजर अमर सब ओरसे पाणिपादयुक्त मैं अन्तर्यामी सनातन हूँ ॥ ४८ ॥
सर्ग हिन्दीटीकासहित (६७)
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता हृदि संस्थितः । अचक्षुरपि पश्यामि
तथाऽकर्णः शृणोम्यहम् ॥ ४९ ॥ वेदाहं सर्वमेवेदं न मां जानाति
कश्चन । प्राहुर्महान्तं पुरुषं मामेकं तत्त्वदर्शिनः ॥ ५० ॥
अपाणिपादवाला वेगवान् सबकुछ ग्रहण करनेवाला हृदयमें स्थित हूँ, विना नेत्रों देखता और विना कानके सुनता हूँ ॥ ४९ ॥ मैं इस सबको जानता हूँ और मुझे कोई नहीं जानता है, तत्वदर्शी मुझको एक महान् पुरुष कहते हैं ॥ ५० ॥
निर्गुणामलरूपस्य यत्तदैश्वर्यमुत्तमम् । यन्न देवा विजानंति
मोहिता मायया मम ॥ ५१ ॥ यन्मे गुह्यतमं देहं सर्वगं तत्त्वदर्शिनः ।
प्रविष्टा मम सायुज्यं लभंते योगिनोऽव्ययम् ॥ ५२ ॥
निर्गुण अमलरूप जो उत्तम ऐश्वर्य है जिसको मेरी मायासे मोहित हुए देवता भी मुझको नहीं जानते हैं ॥ ५१ ॥ जो मेरा गुह्यरूप सर्वगामी देह है उसमें तत्त्वदर्शी प्रवेश कर मेरे सायुज्यको प्राप्त होते हैं ॥ ५२ ॥
येषां हि न समापन्नमाया वै विश्वरूपिणी । लभन्ते परमं शुद्धं
निर्वाणं ते मया सह ॥ ५३ ॥ न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि ।
प्रसादान्मम ते वत्स एतद्वेदानुशासनम् ॥ ५४ ॥
जिनको यह विश्वरूपिणी माया नहीं लिपटी है वे मेरे साथ परम शुद्ध निर्वाणको प्राप्त होते हैं ॥ ५३ ॥ सौ करोड कल्पमें भी उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती, हे वत्स ! मेरी कृपासे ऐसा होता है यही वेदका अनुशासन है ॥ ५४ ॥
नापुत्रशिष्ययोगिभ्यो दातव्य हनुमन्क्वचित् । यदुक्तमेतद्विज्ञानं
सांख्ययोगसमाश्रयम् ॥ ५५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदि काव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे
सांख्ययोगे नामैकादशः सर्गः ॥ ११ ॥
हे हनुमत् ! अपुत्र अशिष्य अयोगीको यह नहीं देनी चाहिये, जो यह मैंने सांख्ययोग मिश्रित ज्ञान आपसे वर्णन किया है ॥ ५५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रा. वा. आदि. अद्भुत. ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां
सांख्ययोगो नामैकादशः सर्गः ॥ ११ ॥
(६८) अद्भुतरामायण [ द्वादश-
द्वादश सर्ग
उपनिषदकथन करना
पुना रामः प्रवचनमुवाच द्विजपुंगवः । अव्यक्तादभवत्कालः प्रधानं पुरुषः परः ॥ १ ॥ तेभ्यः सर्वमिदं जातं तस्मात्सर्वमहं जगत् । सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ॥ २ ॥
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति । सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ॥ ३ ॥ सर्वाधारं स्थिरानंदमव्यक्तं द्वैतवर्जितम् । सर्वोपमानरहितं प्रमाणातीतगोचरम् ॥ ४ ॥
फिर रामचन्द्र कहने लगे हे ब्राह्मणश्रेष्ठ । अव्यक्तसे काल हुआ उससे पर प्रधान पुरुष हुआ ॥ १ ॥ इनसे यह सब जगत् उत्पन्न हुआ है, वह सब ओरसे हस्त चरण शिर मुखवाला है ॥ २ ॥ सब ओरसे कर्णवान् और सब ओरसे आवृत्त हुआ स्थित है सब इन्द्रियगुणोंका आभासरूप, सब इन्द्रियोंसे वर्जित ॥ ३ ॥ सर्वाधार, स्थिरानंद, अव्यक्त, द्वैतवर्जित, सब उपमानसे रहित, प्रमाणसे रहित, तथा इंद्रियोंसे परे ॥ ४ ॥
निर्विकल्पं निराभासं सर्वाभासं परामृतम् । अभिन्नं भिन्नसंस्थानं शास्वतं ध्रुवमव्ययम् ॥ ५ ॥ निर्गुणं परमं व्योम तज्ज्ञानं सूरयो विदुः । स आत्मा सर्वभूतानां स बाह्याभ्यंतरात्परः ॥ ६ ॥
निर्विकल्प निराभास सर्वाभास परामृत अभिन्न भिन्न संस्थावाले शाश्वत ध्रुव अविनाशी ॥ ५ ॥ निर्गुण परम व्योम उसके ज्ञानको कवि कहते हैं वही सब भूतोंका आत्मा बाह्य अन्तरसे परे है ॥ ६ ॥
सोऽहं सर्वत्रगः शांतो ज्ञानात्मा परमेश्वरः । मया ततमिदं विश्वं जगदव्यक्तरूपिणा ॥ ७ ॥ मत्स्थानि सर्वभूतानि यस्तं वेद स वेदवित् । प्रधानं पुरुषं चैव तत्त्वद्वयमुदाहृतम् ॥ ८ ॥
सो मैं सर्वत्रगामी शांत ज्ञानात्मा परमेश्वर हूं मुझे अव्यक्त रूपवालेने यह सब जगत् विस्तार कर रक्खा है ॥ ७ ॥ सब प्राणी मेरे स्थानमें हैं, इसको जानता है, वह वेदका जाननेवाला कहता है, प्रधान और पुरुष यह दोही तत्त्व कहते हैं ॥ ८ ॥
[ सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (६९)
तयोरनादिर्निर्दिष्टः कालः संयोजकः परः । त्रयमेतदनाद्यंत-
मध्यक्ते समवस्थितम् ॥ ९ ॥ तदात्मकं तदन्यत्स्यात्तद्रूपं मामकं
विदुः । महदाद्यं विशेषांतं संप्रसूतेऽखिलं जगत् ॥ १० ॥
उनका संयोग करनेवाला अनादि निर्दिष्ट काल है, यह तीनों अनादि
अनन्त अव्यक्तमें स्थित हैं । ९ ।। तदात्मक अन्य दो परन्तु वह रूप मेरा
ही महत्से लेकर है विशेषपर्यंत सब जगत्को निर्मित करती है ।।१०।।
या प्रकृतिरुद्दिष्टा मोहिनी सर्व देहिनाम् । पुरुषः प्रकृतिस्थतोऽ-
पिभुक्ते यः प्राकृतान्गुणान् ॥ ११ ॥ अहंकारो विविक्तत्वात्प्रोच्यते
पञ्चविंशकः । आद्यो विकारः प्रकृतिर्महानात्मेति कथ्यते ॥ १२ ॥
जो यह प्रकृति सब प्राणियोंकी मोहित करनेवाली कही गई है और पुरुष
प्रकृतिमें स्थित हुआ प्रकृतिके गुणोंको भोगता है ।।११।। अहंकारसे विविक्त
होनसे वह पच्चीस तत्त्वका कहा जाता है आद्य विकार प्रकृति और महान्
आत्मा कहा जाता है ॥ १२ ॥
विज्ञानशक्तिर्विज्ञानादहंकारस्तदुत्थितः । एक एव महानात्मा
सोऽहंकारोऽभिधीयते ॥ १३ ॥ स जीवः सोऽन्तरात्मेति गीयते तत्त्व
चिंतकैः । तेन वेदयते सर्वं सुखं दुखं च जन्मसु ॥ १४ ॥
विज्ञानसे विज्ञानशक्ति और उससे अहंकारयुक्त कहा जाता है ।। १३ ।।
वही जीव अन्तरात्मा नामसे तत्वविज्ञानियों द्वारा गाया जाता है उसके
द्वारा जन्मोंका सुख दुःख जाना जाता है ।। १४ ।।
स विज्ञानात्मकस्तस्य मनःस्यादुपकारकम् । तेनाषिवेकतस्तस्मा
संसारः पुरुषस्य नु ॥ १५ ॥ स चाविवेकः प्रकृतौ संगात्कालेन
सोऽभवत् । कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ॥ १६ ॥
विज्ञानात्मक वही है, मन उसका उपकारी है, उसको अविवेक होनसे
संसार प्राप्त हुआ है ।। १५ ।। वह अविवेक प्रकृतिके संगसे काल द्वारा प्राप्त
हुआ है, कालही प्राणियोंको प्रगट कर संहार कर जाता है ।। १६ ।।
सर्वे कालस्य वशगा न कालः कस्यचिद्वशे । सोऽन्तरा सर्वमेवेदं
नियच्छति सनातनः ॥ १७ ॥ प्रोच्यते भगवान्प्राणः सर्वज्ञः पुरुषः
परः । तर्वेंद्रियेभ्यः परमं मनः प्राहुर्मनीषिणः ॥ १८ ॥
(७०) अद्भुतरामायण [ द्वादश-
सब कालके वशमें हैं, काल किसीके वशमें नहीं है वह सनातन सबके अन्तरमें स्थित हुआ वश करता है ॥ १७ ॥ वही भगवान् प्राण सर्वज्ञ पुरुष कहाता है, विद्वान् सब इन्द्रियोंसे परे मनको कहते हैं ॥ १८ ॥
मनसश्चाप्यहंकारमहंकारान्महान् परः । महतः परमव्यक्त-
मव्यक्तात्पुरुषः परः ॥ १९ ॥ पुरुषाद्भगवान्प्राणस्तस्य सर्वमिदं
जगत् । प्राणात्परतरं व्योम व्योमातीतोऽग्निरीश्वरः ॥ २० ॥
मनसे परे अहंकार अहंकारसे परे महान्, उससे परे अव्यक्त इससे परे पुरुष ॥ १९ ॥ पुरुषसे परे भगवान् प्राण और उसके वशीभूत यह सब जगत् है प्राणसे परे व्योम और आकाशसे परे ईश्वर है ॥ २० ॥
सोऽहं सर्वत्रगः शांतो ज्ञानात्मा परमेश्वरः । नास्ति मत्परमं भूतं
मां विज्ञाय विमुच्यते ॥ २१ ॥ नित्यं हि नास्ति जगति भूतं स्थावर-
जंगमम् । ऋते मामेकमव्यक्तं व्योमरूपं महेश्वरम् ॥ २२ ॥
सो मैं सर्वत्रगामी शान्त ज्ञानात्मा परमेश्वर हूँ मुझसे परे और कुछ नहीं, मुझे जानकर प्राणी मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥ स्थावर जंगम जगत्में नित्य हीं रहेंगे, केवल एक आकाशरूप महेश्वर मैंही स्थित हूँ ॥ २२ ॥
सोऽहं सृजामि सकलं संहरामि सदा जगत् । मायी मायामयो
देवः कालेन सह संगतः ॥ २३ ॥ मत्सन्निधावेष कालः करोति सकलं
जगत् ॥ नियोजयत्यनंतात्मा ह्येतद्वेदानुशासनम् ॥ २४ ॥
इत्यार्षे श्रीमदा. आदि. वाल्मी. उपनिषत्कथनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
सो मैं यह सब उत्पन्न करके संहार कर जाता हूं मैं मायामय देव कालके सम्बन्धसे सब कुछ कहता हूँ ॥ २३ ॥ मेरी इच्छा निकटतासे यह काल सब जगत् रखता है और अनन्तात्मा इसके कृत्यमें लगता है, यही वेदका अनुशासन है ॥ २४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्वा. वाल्मीकीये आदिकाव्ये ज्वालाप्रसादमिश्रकृत भाषा-टीकायां उपनिषत्कथनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
सर्ग हिन्दीटीकासहित (७१)
सर्ग हिन्दीटीकासहित (७१)
त्रयोदश सर्ग
रामका भक्तियोग कहना
वक्ष्ये समाहितमनाश्शृणुष्व पवनात्मज ॥ येनेदं लभ्यते रूपं येनेदं संप्रवर्तते ॥ १ ॥ नाहं तपोभिर्विविधैर्न दानेन च चेज्यया ॥ शक्यो हि पुरुषैर्ज्ञातुमृते भक्तिमनुत्तमाम् ॥ २ ॥
हे महावीर ! जो मैं कहता हूँ सो सावधान मन होकर सुनो जिससे यह सब रूप प्राप्त होकर प्रवृत्त होता है ॥ १ ॥ न मैं अनेक प्रकारके तप न दान न यज्ञसे पुरुषोंके द्वारा जाना जाता हूं केवल जो मेरी भक्ति करते हैं वही मुझको प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥
अहं हि सर्वभावानांमंतस्तिष्ठासि सर्वगः ॥ मां सर्वसाक्षिणं लोका न जानंति प्लवंगम ॥ ३ ॥ यस्मांतरा सर्वमिदं यो हि सर्वांतर परः ॥ सोऽहं धाता विधाता च लोकेऽस्मिन्विश्वतोमुखः ॥ ४ ॥
मैं सर्वगामी सब भावोंके अन्तमें स्थित रहता हूँ हे वीर सर्वसाक्षी मुझको लोक जाननेमें समर्थ नहीं होते ॥ ३ ॥ जिसके अन्तरमें यह सब हैं और जो सर्वांतर्यामी परेसे परे हैं वह मैं धाता विधाता इस लोकमें सब स्थित हो रहा हूँ ॥ ४ ॥
न मां पश्यंति मुनयः सर्वेऽपि त्रिदिवौकसः ॥ ब्राह्मणा मनवः शक्रा ये चान्ये प्रथितौजसः ॥ ५ ॥ गृणंति सततं वेदा मामेकं परमेश्वरम् । जयन्ति विविधैरंगिन ब्राह्मणा वैदिकैर्मखैः ॥ ६ ॥
सब देवता और मुनि मुझे देखनेसे समर्थ नहीं होते हैं ब्राह्मण मनु इन्द्र तथा और देवता हैं ॥ ५ ॥ सब वेद मुझही एक परमेश्वरका निरन्तर यजन करते हैं, और कहते हैं ब्राह्मण अनेक यज्ञोंसे मेरा यजन करते हैं ॥ ६ ॥
सर्वे लोका नमस्यन्ति ब्रह्मलोके पिता महम् । ध्यायंति योगिनो देवं भूताधिपतिमीश्वरम् ॥७॥ अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता चैव फलप्रद ॥ सर्वदेवतनुर्भूत्वा सर्वात्मा सर्व संस्तुतः ॥ ८ ॥
सब लोक ब्रह्मलोकमें पितामहको नमस्कार करते हैं योगी भूताधिपति ईश्वरको नित्य ध्यान करते हैं ॥ ७ ॥ मैं सब यज्ञोंका भोक्ता और फलका
(७२) अद्भुतरामायण [ त्रयोदश-
देनेवाला हूँ सब देवका शरीर होकर सर्व आत्मा सबसे स्तुतिको प्राप्त होता हूँ ॥ ८ ॥
मां पश्यंतीह विद्वांसो धार्मिका वेदवादिनः । तेषां संनिहितो नित्यं ये भक्ता मामुपासते ॥९॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या धार्मिका मामुपासते । तेषां ददामि तत्स्थानमानंदं परमं पदम् ॥ १० ॥
धर्मात्मा वेदवादी विद्वान् मुझको देखते हैं, जो भक्त मेरी उपासना करते हैं मैं सदा उनके निकट निवास करता हूँ ॥ ९ ॥ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य धर्मात्मा मेरी उपासन-करते हैं, उनको मैं आनंदमय परम पदका स्थान देता हूँ ॥ १० ॥
अन्येऽपि ये विकर्मस्थाः शूद्राद्या नीच जातयः । भक्तिमंतः प्रमुच्यंते कालेन मयि संगताः ॥ ११ ॥ न मद्भक्ता विनश्यंते मद्भक्ता वीतकल्मषाः ॥ आदावेतत्प्रतिज्ञातं न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ १२ ॥
और भी जो शूद्रादि नीच जाति विकर्ममें स्थित हैं वे भक्ति करनेके समय मेरे निकट प्राप्त होकर मुक्त हो जाते हैं ॥ ११ ॥ मेरे भक्त पाप रहित हो जाते हैं, उनका नाश नहीं होता यह पहलेहीसे मेरी प्रतिज्ञा है कि, मेरे भक्त नाश नहीं होते ॥ १२ ॥
यो वा निंदति तं मूढो देवदेवं स निंदति ॥ यो हि तं पूजयेद्भक्त्या स पूजयति मां सदा ॥ १३ ॥ पत्रं पुष्पं फलं तोयं मदाराधनकार- णात् ॥ यो मे ददाति नियतः स मे भक्तः प्रियो मतः ॥ १४ ॥
जो मूढ मेरे भक्तकी निन्दा करता है वह देवदेवकी निन्दा करता है और जो उनको भक्तिसे पूजन करता है वह मेरा पूजन करता है ॥ १३ ॥ जो मेरे पूजनको पत्र पुष्प फल जल प्रदान करता है वह मेरा भक्त और मेरा प्रिय है ॥ १४ ॥
निधाय दत्तवान्वेदानशेषान्नास्य निःसृतान् ॥ १५ ॥ अहमेव हि सर्वेषां योगिनां गुरुरव्ययः ॥ धार्मिकाणां च गोप्ताहं निहन्ता वेद विद्विषाम् ॥ १६ ॥
में जगत्के आदिमें ब्रह्मा परमेष्ठीका निर्माण कर सम्पूर्ण वेदोंको प्रदान करता हुआ, जो मेरे मुखसे निकले हैं ॥ १५ ॥ मैं ही सम्पूर्ण योगियोंका अविनाशी गुरु हूँ धर्मात्माओंका रक्षक और वेदद्वेषियोंका नाशक हूँ ॥ १६ ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७३)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७३)
अहं वै सर्व संसारान्मोचको योगिनामिह ॥ संसारहेतुरेवाहं सर्वसंसारवर्जितः ॥ १७ ॥ अहमेव हि संहर्ता स्रष्टाहं परिपालकः ॥ मायावी मामिका शक्तिर्माया लोकविमोहिनी ॥ १८ ॥
में ही योगियोंके साथ सब संसारका मोचक हूँ, मैं ही सब संसारसे रहित सब संसारका हेतु हूँ ॥ १७ ॥ मैंही संहार करनेवाला और निर्माता तथा परिपालन करनेवाला हूँ मायावी मेरी शक्ति सब लोकको मोहित करती है ॥ १८ ॥
ममैव च परा शक्तिर्या सा विद्येति गीयते । नाशयामि तया मायां योगिनां हृदि संस्थितः ॥ १९ ॥ अहं हि सर्वशक्तीनां प्रवर्तकनिवर्तकः ॥ आधारभूतः सर्वासां निधानममृतस्य च ॥ २० ॥
वह मेरीही शक्ति विद्यानामसे गायी जाती है, योगियोंके हृदयमें स्थित हो मैं उस मायाको दूर करता हूँ ॥ १९ ॥ मैं ही सब शक्तियोंका प्रवृत्त करनेवाला हूँ, सबका आधारभूत हो अमृतका निधान हूँ ॥ २० ॥
एका सर्वांतरा शक्तिः करोति विविधं जगत् ॥ भूत्वा नारायणोऽनंतो जगन्नाथो जगन्मयः ॥ २१ ॥ तृतीया महती शक्तिर्निहंति सकलं जगत् ॥ तामसी मे समाख्याता कालात्मा रुद्ररूपिणी ॥ २२ ॥
एकही सर्वांतरा शक्ति जगत्को अनेक प्रकारसे करती है, वह जगन्नाथ अविनाशी नारायण जगन्नाथ है ॥ २१ ॥ तीसरी महान् शक्ति सो जगत्को निर्माण करती है वह तामसी रुद्ररूपिणी कलात्मा रुद्ररूपवाली है ॥ २२ ॥
ध्यानेन मां प्रपश्यंति केचिज्ज्ञानेन चापरे ॥ अपरे भक्तियोगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ सर्वेषामेव भक्तानामेष प्रियतरो मम ॥ २३ ॥ यो विज्ञानेन मां नित्यमाराधयति नान्यथा ॥ अन्येच ये त्रयो भक्ता मदाराधनकांक्षिणः ॥ २४ ॥
कोई मुझे ध्यानसे और कोई ज्ञानसे देखते हैं, कोई भक्तियोग और कोई कर्मयोगसे मुझको देखते हैं सब भक्तोंमें मुझे यह सबसे अधिक प्रिय है ॥ २३ ॥ जो ज्ञानसे मेरी नित्य आराधना करता है और जो दूसरे तीन प्रकार भक्त मेरी आराधनाके करनेवाले हैं ॥ २४ ॥
(७४) अद्भुतरामायण [ त्रयोदश-
तेऽपि मां प्राप्नुवंत्येव नावर्तंते च वै पुनः ।। मया ततमिदं कृत्स्ने-
मेतद्यो वेद सोऽमृतः ।। २५ ।। पश्याम्यशेषमेवेदं वर्तमानं स्वभा-
वतः ।। करोति काले भगवान्महायोगेश्वरः स्वयंम् ।। २६ ।।
वे भी मुझको प्राप्त होकर फिर संसारमें नहीं गिरते हैं, मैंने इस जगत्को
विस्तार कर रक्खा है जो इसे जानता है सो अमृत होता है ।। २५ ।। मैं स्वभाव-
से इस जगत्को वर्तमानके समान देखता हूँ, समयपर महायोगेश्वर भगवान्
इसको कहते हैं ।। २६ ।।
योगं संप्रोच्यते योगी मायी शास्त्रेषु सूरिभिः ।। योगेश्वरोऽसौ
भगवान्महादेवो महान्प्रभुः ।। २७ ।। महत्त्वात्सर्वसत्त्वानां परत्वा-
त्परमेश्वरः ।। प्रोच्यते भगवान्ब्रह्मा महान्ब्रह्ममयो यतः ।। २८ ।।
वही योगी मायी शास्त्रोंमें योगरूपसे कहा जाता है वह योगरूपसे कहा
जाता है वह योगेश्वर भगवान् महायोगेश्वर महाप्रभु है ।। २७ ।। महत्तत्त्व
होनेसे सब जीवोंका पर होनेसे परमेश्वर है, वह महान् ब्रह्ममय होनेसे ब्रह्मा
कहलाते हैं ।। २८ ।।
यो मामेवं विजानाति महायोगेश्वरेश्वरम् ।। सोऽविकंपेन
योगेन युज्यते नात्र संशयः ।। २९ ।। सोऽहं प्रेरयिता देवः परमा-
नन्दमाश्रिताः ।। तिष्ठामि योगी सततं यस्तद्वेद स वेदवित् ।। ३० ।।
जो इस प्रकार मुझको महायोगेश्वर जानता है वह अविकम्पयोगसे युक्त
होता है इसमें सन्देह नहीं ।। २९ ।। सो मैं परमानन्दरूपसे प्रेरणा किया हुआ
सबके आश्रित हूँ नित्ययोगमें स्थित रहता हूँ जो इसको जानता है वह वेदको
जानता है ।। ३० ।।
इति गुह्यतमं ज्ञानं सर्ववेदेषु निश्चितम् ।। प्रसन्नचेतसे देयं धार्मिका
याहिताग्नये ।। ३१ ।।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे भक्तियोगो
नाम त्रयोदशः सर्गः ।। १३ ।।
यह गुप्त ज्ञान सब वेदोंका सम्मत है, यह प्रसन्नचित्तवाले धर्मात्माओंको
देना चाहिये जो अग्निहोत्र करनेवाले हैं ।। ३१ ।।
इत्यार्षे श्रीमद्रामयणे वाल्मी. अद्भु. भाषाटी. भक्तियोगो नाम त्रयोदशः सर्गः ।। १३ ।।
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७५)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७५)
चतुर्दश सर्ग
रामचन्द्र और महावीरजीका संवाद
सर्वलोकैकनिर्माता सर्वलोकैकरक्षिता ॥ सर्वलोकैकसंहर्ता सर्वा-
त्माहं सनातनः ॥ १ ॥ सर्वेषामेव वस्तूनामंतर्यामी पिता ह्यहम् ॥
मय्येवान्तःस्थितं सर्वं नाहं सर्वत्र संस्थितः ॥ २ ॥
सब लोकोंका निर्माण करनेवाला सब लोकका रक्षक, सर्वलोकका संहार-
कर्त्ता, सर्वात्मा, सनातन मैं हूँ ॥ १ ॥ सब वस्तुओंका अन्तर्यामी पिता हूँ
मेरे अन्तःकरणमें सब स्थित हैं मैं नहीं ॥ २ ॥
भवता चाद्भुते दृष्टं यत्स्वरूपं तु मामकम् ॥ ममैषा ह्युपमा वत्स
मायया दर्शिता मया ॥ ३ ॥ सर्वेषामेव भावानांमंतरा समवस्थितः ॥
प्रेरयामि जगत्सर्वं क्रियाशक्तिरियं मम ॥ ४ ॥
तुमने जो मेरा अद्भुतरूप देखा है हे वत्स ! मायाद्वारा मैंनेही यह रूप
निर्माण किया है ॥ ३ ॥ सब भावोंके अन्तरमें में ही स्थित हूँ, सब जगत्को
मैं प्रेरणा करता हूँ, यह मेरी क्रियाशक्ति है ॥ ४ ॥
ययेदं चेष्टते विश्वं मत्स्वभावानुवर्ति च ॥ सोऽहं काले जगत्कृत्स्नं
करोमि हनुमन् किल ॥ ५ ॥ संहराम्येकरूपेण द्विधावस्था ममैव
तु ॥ आदिमध्यांतनिर्मुक्तो मायातत्त्व प्रवर्तकः ॥ ६ ॥
यह जगत् मेरे द्वारा चेष्टा किया जाता है और मेरे स्वभावका अनुवर्तन
करनेवाला है, हे हनुमन् ! सो मैं समयपर सब जगत्को निर्माण करता हूँ ॥ ५ ॥
एक रूपसे कहता हूँ, यह दो प्रकारसे मेरीही अवस्था है, आदि मध्य अन्तरसे
रहित तत्त्वका प्रवृत्त करनेवाला मैं ही हूँ ॥ ६ ॥
क्षोभयामि च सर्गादौ प्रधानपुरुषावुभौ ॥ ताभ्यां संजायते सर्वं
संयुक्ताभ्यां परस्परम् ॥ ७ ॥ महदादिक्रमेणैव मम तेजो विजृंभि-
तम् ॥ यो हि सर्वजगत्साक्षी कालचक्रप्रवर्तकः ॥ ८ ॥
सृष्टिकी आदिमें मैं प्रधान और पुरुषको क्षुभित करता हूँ, उनके परस्पर
संयुक्त होनेसे यह जगत् होता है ॥ ७ ॥ महदादिके क्रमसे यह मेरा तेज फैल
रहा है, जो सब जगत्का साक्षी कालचक्रका प्रवृत्त करनेवाला है ॥ ८ ॥
(७६) अद्भुतरामायण [ चतुर्दश-
हिरण्यगर्भो मार्तंडः सोऽपि मद्देहसंभवः ॥ तस्मै दिव्यं स्वमैश्वर्यं
ज्ञानयोगं सनातनम् ॥ ९ ॥ दत्तवानात्मजावेदान् कल्पादौ चतुरः
किल ॥ स मन्नियोगतो ब्रह्मा सदा मद्भाव भावितः ॥ १० ॥
हिरण्यगर्भ मार्तण्ड है वह मेरे देहसे प्रगट है, उसको मैंने अपना दिव्य
ऐश्वर्यको सनातन ज्ञानयोग ॥ ९ ॥ और कल्पकी आदिमें चारों वेदोंको दिया
है, वह मन्नियोगसे भगवान् सदा सद्भावमें स्थित हुए ॥ १० ॥
दिव्यं तन्मामकैश्वर्यं सर्वदा वहति स्वयम् ॥ स सर्वलोकनिर्माता
मन्नियोगेन सर्ववित् ॥ ११ ॥ भूत्वा चतुर्मुखः सर्वं सृजत्येवात्मसं-
भवः ॥ योऽपि नारायणोऽनन्तो लोकानां प्रभवाव्ययः ॥ १२ ॥
उस मेरे दिव्य ऐश्वर्यको सदा धारण करते हैं, यह सबके निर्माता सबके
ज्ञाता मेरी आज्ञासे ॥ ११ ॥ चतुर्मुखी होकर सृष्टिको निर्माण करते हैं,
जो नारायण अनन्त लोकोंके प्रभु अविनाशी हैं ॥ १२ ॥
ममैव परमा मूर्तिः करोति परिपालनम् ॥ योऽन्तकः सर्वभूतानां
रुद्रः कालात्मकः प्रभुः ॥ १३ ॥ मदाज्ञयाऽसौ सततं संहरत्येव मे
तनुः ॥ हव्यं वहति देवानां कव्यं कव्याशिनामपि ॥ १४ ॥
वह मेरीही परमा मूर्ति होकर जगत्का पालन करते हैं, जो सब भूतोंका
अन्तक रुद्र कालात्मा प्रभु है ॥ १३ ॥ वह मेरा शरीर मेरी आज्ञासे ही यह
सब संहार करता है, देवताओंके निमित्त हव्य वहन करता हुआ ॥ १४ ॥
पाकं च कुरुते वह्निः सोऽपि मच्छक्तिचोदितः ॥ भुक्तमाहारजातं
यत्पचत्येतदहर्निशम् ॥ १५ ॥ वैश्वानरोऽग्निर्भगवानीश्वरस्य नियो-
गतः ॥ यो हि सर्वांभसां योनिर्वरुणो देवपुंगवः ॥ १६ ॥
अग्नि जो पाक करता है वह भी मेरी शक्तिसे प्रेरित हुआ करता है, जो
कुछ भोजन किया आहार है मेरे बलसे जठराग्नि उसे पचाती है ॥ १५ ॥
भगवान् वैश्वानर अग्नि मेरी आज्ञासे यह करता है, जो सम्पूर्ण जलोंकी योनि
वरुणदेवता है ॥ १६ ॥
स संजीवयते सर्वमीशस्यैव नियोगतः ॥ योऽन्तस्तिष्ठति भूतानां
बहिर्देवो निरंजनः ॥ १७ ॥ मदाज्ञयासौ भूतानां शरीराणि बिभर्ति
हि ॥ योऽपि संजीवनो नॄणां देवानाममृताकरः ॥ १८ ॥
सर्गं ] हिन्दीटीकासहित (७७)
सर्गं ] हिन्दीटीकासहित (७७)
वह ईशके नियोगसे ही सबको संजीवित करता है जो निरंजन देव जीवोंके बाहर भीतर स्थित है ॥ १७ ॥ मेरीही आज्ञासे यह प्राणियोंके शरीरको भरण पोषण करता है जो देवताओंके संजीवनमें अमृत रूप है ॥ १८ ॥]
सोमः स मन्नियोगेन चोदितः किल वर्तते ॥ यः स्वभासा जगत्कृत्स्नं प्रकाशयति सर्वदा ॥ १९ ॥ सूर्यो वृष्टिं वितनुते शास्त्रेणैव स्वयंभुवः ॥ योऽप्यशेषजगच्छास्ता शक्रः सर्वामरेश्वरः ॥ २० ॥
चन्द्रमा मेरेही आज्ञासे वर्तता है, जो स्वभावसे सारे जगत्को प्रवृत्त कर देता है ॥ १९ ॥ सूर्य ब्रह्माजीकी आज्ञासे वृष्टि करता है, जो संपूर्ण जगत्का शास्ता नियमसे साधुतापूर्वक वर्तता है, सब देवताओंका अधिपति है ॥ २० ॥
यज्ञानां फलदो देवो वर्ततेऽसौ मदाज्ञया ॥ यः प्रशास्ता ह्यसाधूनां वर्तते नियमादिह ॥ २१ ॥ यमो वैवस्वतो देवो देवदेवनियोगत ॥ योऽपि सर्वधनाध्यक्षो धनानां संप्रदायकः ॥ २२ ॥
वह देव यज्ञोंके फलका देनेवाला मेरी आज्ञासे वर्तता है, असाधुओंका शास्ता नियमसे वर्तता है ॥ २१ ॥ वैवस्वत यमदेव मेरीही आज्ञासे वर्तता है, जो सम्पूर्ण धनाध्यक्ष और धनोंके देनेवाले हैं ॥ २२ ॥
सोऽपीश्वरनियोगेन कुबेरो वर्तते सदा ॥ यः सर्व रक्षसां नाथस्तापसानां फलप्रदः ॥ २३ ॥ मन्नियोगादसौ देवो वर्तते निर्ऋतिः सदा ॥ वैतालगणभूतानां स्वामी भोगफलप्रदः ॥ २४ ॥
वह कुवेरभी ईश्वरकी आज्ञासे सदा वर्तता हैं जो सम्पूर्ण राक्षसोंका नाथ तपस्वियोंका फल देनेवाला है ॥ २३ ॥ वह निर्ऋतिभी सदा मेरी आज्ञासे वर्तता है, वेतालगण भूतोंका स्वामी भोगफल देनेवाला है ॥ २४ ॥
ईशानः सर्वभक्तानां सोऽपि तिष्ठेन्ममाज्ञया॥यो वामदेवौंगिरसः शिष्यो रुद्रगणाग्रणीः ॥ २५ ॥ रक्षको योगिनां नित्यं वर्ततेऽसौ मदाज्ञया ॥ यश्च सर्वजगत्पूज्यो वर्तते विघ्नकारकः ॥ २६ ॥
सब भक्तोंके ईशानभी मेरी आज्ञासे वर्तता है,जो वामदेव आंगिरस रुद्रगणोंका अग्रणी शिष्य है ॥ २५ ॥ नित्य योगियोंका रक्षक है वहभी मेरी आज्ञासे वर्तता है, जो सर्व जगत्के पूज्य विघ्नकारक गणेशजी हैं ॥ २६ ॥
विनायको धर्मनेता सोऽपि मद्वचनात्किल ॥ योऽपि वेदविदां श्रेष्ठो देवसेनापतिः प्रभुः ॥ २७ ॥ स्कन्दोऽसौ वर्तते नित्यं स्वयंभूप्रतिचोदितः ॥ ये च प्रजानां पतयो मरीच्याद्या महर्षयः ॥ २८ ॥
(७८) अद्भुतरामायण [ चतुर्दश-
विनायक धर्मनेता है वहभी मेरी आज्ञासे वर्तता है, जो वेद जाननेवालोंमें श्रेष्ठ देवताओंके सेनापति प्रभु हैं ।। २७-।। वह स्कन्दभी प्रभुकी आज्ञामेंही वर्तते हैं, जो प्रजाओंके पति मरीच्यादि महर्षि हैं ।। २८ ।।
सृजंति विविधं लोकं परस्यैव नियोगतः ।। या च श्रीः सर्वभूतानां ददाति विपुलां श्रियम् ।। २९ ।। पत्नी नारायणस्यासौ वर्तते मदनुग्रहात् ।। वाचं ददाति विपुलां या च देवी सरस्वती ।। ३० ।।
विविधलोक नारायणकी आज्ञासेही रचते हैं, जो लक्ष्मी सब भूतोंको महाश्री देती है ।। २९ ।। वह नारायणकी पत्नी मेरी आज्ञासे वर्तती है, जो देवी सरस्वती विपुल वाणी देती है ।। ३० ।।
सापीश्वरनियोगेन चोदिता संप्रवर्तते ।। याऽशेष पुरुषाघोरान्नरकात्तारयत्यपि ।। ३१ ।। सावित्री संस्मृता देवी देवाज्ञानुविधायिनी ।। पार्वती परमा देवी ब्रह्मविद्याप्रदायिनी ।। ३२ ।। यापि ध्याता विशेषेण सापि मद्धच नानुगा ।। योजनंतो महिमानंतः शेषोऽशेषा ऽमरप्रभुः ।। ३३ ।। दधाति शिरसा लोकं सोऽपि देवनियोगतः ।। योऽग्निः संवर्तको नित्यं वडवारूपसंस्थितः ।। ३४ ।।
वहभी ईश्वरके नियोगसे प्रेरित हो वर्तती है जो अनेक पुरुषोंको नरकसे तारती है ।। ३१ ।। वह सावित्री देवी वशीभूत होतीहै जो पार्वती परमादेवी ब्रह्मविद्याकी विधान करनेवाली है ।। ३२ ।। ध्यान करनेवालोंको फल मेरेही आज्ञासे देती है जो अनन्त महिमावाले शेषजी देवाधिपति हैं।।३३।। वहभी देवदेवकी आज्ञासे पृथिवीको शिरपर धारण करते हैं जो नित्य संवर्तक अग्नि वडवारूपसे स्थित है ।। ३४ ।।
पिबत्यखिलमंभोधिमीश्वरस्य नियोगत ।। आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्च तथाश्विनौ ।। ३५ ।। अन्याश्च देवताः सर्वा मच्छासनमधिष्ठिताः ।। गंधर्वा उरगा यक्षाः सिद्धाः साध्याश्च चारणाः ।। ३६ ।।
वहभी ईश्वरहीकी आज्ञासे सब सागरको शोषता है, आदित्य वसु रुद्र मरुत अश्विनीकुमार ।। ३५ ।। और भी सब देवता मेरे शासनमें स्थित रहते हैं, गन्धर्व उरग यक्ष सिद्ध साध्य चारण ।। ३६ ।।
भूतरक्षःपिशाचाश्च स्थिताः शास्त्रे स्वयंभुवः ।। कलाकाष्ठानिमेषाश्च मुहूर्ता दिवसाः क्षणाः ।। ३७ ।। ऋत्वब्दमासपक्षाश्च स्थिताः शास्त्रे प्रजापते ।। युगमन्वंतराण्य्येव ममतिष्ठंति शासने । ३८।
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७९)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७९)
भूत राक्षस पिशाच सब स्वयंभूकी आज्ञामें स्थित हैं कला काष्ठा निमेष मुहूर्त दिवस ॥ ३७ ॥ ऋतु वर्ष महीना पखवारा युग मन्वन्तर सब परमात्माके शासनमें स्थित हैं ॥ ३८ ॥
पराश्चैव परार्द्धाश्च कालभेदास्तथापरे ॥ चतुर्विधानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ॥ ३९ ॥ नियोगादेव वर्तंते सर्वाण्येव स्वयंभुवः ॥ पत्तनानि च सर्वाणि भुवनानि च शासनात् ॥ ४० ॥
परा परार्द्ध जितने कालके भेद हैं, चार प्रकारके भूत स्थावर चर ॥ ३९ ॥ सब स्वयंभूके नियोगसे वर्तते हैं, सब पत्तन और भुवन उसीकी आज्ञासे वर्तते हैं ॥ ४० ॥
ब्रह्मांडानि च वर्तंते देवस्य परमात्मनः ॥ अतीतान्यप्यसंख्यानि ब्रह्मांडानि महाज्ञया ॥ ४१ ॥ प्रवृत्तानि पदार्थाघैः सहितानि समं ततः ॥ ब्रह्मांडानि भविष्यंति सह वस्तुभिरात्मगैः ॥ ४२ ॥
असंख्य ब्रह्माण्ड भी उस परमात्माकी आज्ञासे ही वर्तते हैं ॥ ४१ ॥ सब प्रवृत्त हुए पदार्थसमूहोंके साथै ब्रह्मांड अपनी २ वस्तुओंके साथ होते हैं ॥ ४२ ॥
हरिष्यंति सहैवाज्ञां परस्य परमात्मनः ॥ भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ॥ ४३ ॥ भूतादिरादिप्रकृतिर्नियोगान्मम वर्तते ॥ याऽशेषसर्वजगतां मोहिनी सर्वदेहिनाम् ॥ ४४ ॥
वह सब परमात्माकी आज्ञाको वहन करते हैं, भूमि जल अग्नि वायु आकाश मन बुद्धि ॥ ४३ ॥ भूतादि आदि प्रकृति यह सब मेरी आज्ञासेही वर्तते हैं, जो सम्पूर्ण जगत् और देहधारियोंकी मोहिनी है ॥ ४४ ॥
मायापि वर्तते नित्यं सापीश्वरनियोगतः ॥ विधूय मोहकलिलं यथा पश्यति तत्पदम् ॥ ४५ ॥ सापि विद्या महेशस्य नियोगाद्वशवर्तिनी ॥ बहुनात्र किमुक्तेन मम शक्त्यात्मकं जगत् ॥ ४६ ॥
मायाभी नित्य ईश्वरकी आज्ञासे वर्तती है जिसके द्वारा मोहको दूर कर तत्पद देखा जाता है ॥ ४५ ॥ यह विद्या महेशके नियोगसे वशवर्तिनी है, बहुत कहनेसे क्या है यह जगत् मेरी शक्त्यात्मक हैं ॥ ४६ ॥
मयैव पूर्यते विश्वं मय्येव प्रलयं व्रजेत् ॥ अहंहि भगवानीशः स्वयंज्योतिः सनातनः ॥ ४७ ॥ परमात्मा परंब्रह्म मत्तो ह्यन्यन्न विद्यते ॥ इत्येतत्परमं ज्ञानं भवते कथितं मया ॥ ४८ ॥