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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)

Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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सर्ग १] हिन्दीटीकासहित (६५)

तस्मादात्माक्षरः शुद्धो नित्यः सर्वगतो ऽव्ययः ।। उपासितव्यो
मंतव्यः श्रोतव्यश्च मुमुक्षुभिः ।। ३१ ।। यदा मनसि चैतन्यं भाति
सर्वत्रगं सदा ।। योगिनोऽव्यवधानेन तदा संपद्यते स्वयम् ।। ३२ ।।

इस कारण आत्मा अक्षर शुद्ध नित्य सर्वतक अविनाशी है वही उपासना
करने योग्य मानने योग्य और मुमुक्षुओंके सुनने योग्य है ।।३१।। जिस समय
मनमें सर्वगामी चैतन्यका प्रादुर्भाव होता है तब योगी व्यवधानरहित हो
उसको प्रोप्त होता है ।। ३२ ।।

यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभि पश्यति ।। सर्वभूतेषु चात्मानं
ब्रह्म संपद्यते स्वयम् ।। ३३ ।। यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येव न
पश्यति ।। एकीभूतः परेणासौ तदा भवति केवलः ।। ३४ ।।

जिस समय सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनी आत्मामें देखता है और अपनेको
सब भूतोंमें देखता है तब उस ब्रह्मको प्राप्त होता है।।३३।। जो सब भूतोंको
अपनेमें देखता है तब यह एक एकीभूत केवल ब्रह्मको प्राप्त होता है ।। ३४ ।।

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते काया येऽस्य हृदि स्थिताः ।। तदासाव-
मृतीभूतः क्षेमं गच्छति पंडितः ।। ३५ ।। यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनु
पश्यति ।। तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ।। ३६ ।।

जब इसके हृदयकी सब कामना छूट जाती है तब यह पंडित अमृतीभूत
होकर क्षेमको प्राप्त होता है ।। ३५ ।। भूतोंको पृथग्भावको एक स्थानमें
देखता है उसी समय ब्रह्मविचारके विस्तारको प्राप्त होता है ।। ३६ ।।

यदा पश्यति चात्मानं केवलं परमार्थतः ।। मायामात्रं जगत्कृत्स्नं
तदा भवति निर्वृतः ।। ३७ ।। यदा जन्मजरादुःखव्याधीनामेकभेष-
जम् ।। केवलं ब्रह्मविज्ञानं जायतेऽसौ तदा शिवः ।। ३८ ।।

जब परमार्थसे अपनेको केवल एक देखता है और जगत्को माया मात्र
देखता है तब निर्वृति हो जाती है ।। ३७ ।। जिस समय जन्म जरा दुःख
व्याधियोंको एक ही औषधी केवल ब्रह्मज्ञान होता है तब यह शिव होता है ३८

यथा नदी नदा लोके सागरेणैकतां ययुः ।। तद्वदात्माक्षरेणासौ
निष्कलेनैकतां व्रजेत् ।। ३९ ।। तस्माद्विज्ञानमेवास्ति न प्रपञ्चो न
संस्थितिः ।। अज्ञानेनावृतं लोके विज्ञानं तेन मुह्यति ।। ४० ।।

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