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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)

Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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(४०) अद्भुतरामायण [ षष्ठ-

विष्णुदूतैः परिवृतः पथा तेनागतो नृप ।। विष्णुभक्तो महातेजाः
पथि मां दृष्टवान्प्रभु ।।७७।। भुवनेशशरीरंतद्ददर्शोलूक सन्निधौ ।।
पृष्टोऽहं तेन दयया शवसन्निधिसंस्थितः ।। ७८ ।।

विष्णुके दूतोंसे युक्त उस मार्गसे जाता था; उस महातेजस्वी विष्णु
भक्तने मार्गमें राजाको देखा ।। ७७ ।। जब उलूकके निकट भुवनेशका शरीर
देखा तब शवके निकट खडे होकर उसने दयासे पूछा ।। ७८ ।।

भुवनेशस्य नृपतेर्देहोऽयं दृश्यते खग ।। उलूक त्वं च किमिदं
खादितुं चोद्यतो भवान् ।। ७९ ।। तच्छ्रुत्वा हरिमित्राय प्रणम्य
विनयान्वितः ।। कृतांजलिपुटो भूत्वा बहुमानपुरः सरम् ।। ८० ।।

हे पक्षी ! यह तो राजा भुवनेशका शरीर दीखता है और उलूक तू उसको
कैसे भक्षण करता है ।। ७९ ।। यह वचन सुन वह हरिमित्रको प्रणामकर
विनयसे सहित हाथ जोड बहुत मानसे ।। ८० ।।

तत्सर्वं पूर्ववृत्तांतं नारदास्मै न्ववेदयम् ।। पुरापराधं त्वयि
यत्तस्य पाकोऽयमागतः ८१ ।। यावन्मन्वन्तरं विप्रखादिष्यामि
शवं त्विमम् ।। ततः श्वाहं भविष्यामि भविष्यामि ततो नरः ।।८२।।

पहला सब वृत्तांत उससे वर्णन करता हुआ बोला पहले जो तुम्हारा अपराध
किया था उसका यह फल हमको प्राप्त हुआ है ।। ८१ ।। हे विप्र ! एक मन्वन्तर-
तक इस शवको मुझे खाना पडेगा फिर कुत्ता होकर पीछे मनुष्यकी योनि
मिलेगी ।। ८२ ।।

एतदाकर्ण्य करुणो हरिमित्रामहायशाः ।। कृपया मां समाचष्ट
शृणुलूक महीपते ।। ८३ ।। मयि त्वयापराधं यत्तत्सर्वं क्षान्तवान-
हम् ।। शवो ह्यदर्शनं यातु न च श्वा त्वं भविष्यसि ।। ८४ ।।

महायशस्वी दयालू हरिमित्र यह वचन श्रवणकर कृपापूर्वक मुझे बोले,
हे महाबुद्धिमान् उलूक ! तू सुन ।। ८३ ।। जो कुछ तैंने मेरा अपराध किया है
वह मैंने सब क्षमा करदिया, यह शव अन्तर्धान होजाय और तुझको कुत्तेकी
योनि नहीं मिलेगी ।। ८४ ।।

त्वामद्य गानयोगश्च प्राप्नोतु मत्प्रसादतः ।। स्तुहि विष्णुं च
गानेन जिह्वा स्पष्टा च जायताम् ।। ८५ ।। सुरविद्याधराणां च
गंधर्वाप्सरसां तथा । गानाचार्यो भवेथास्त्वं भक्ष्यभोज्यसमन्वितः ८६