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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)

Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (३९)

हरेः कीर्तिं विना चान्यद्ब्राह्मणेन नृपोत्तम ।। न गेययोगे मंतव्यं
तस्मात्पापं त्वया कृतम् ।। ६९ ।। नष्टं ते स्वर्गलोकाद्यंगच्छ पर्वतको
टरम् ।। ।। पूर्वोत्सृष्टं स्वदेहं ते खाद नित्यं निकृत्य वै ।। ७० ।।

गीत नाटच लयसे युक्त गायन करते हुए हरिमित्रका तुमने संपूर्ण धन हरण कर लिया ।। ६७ ।। जो कुछ उपहारादि था वह सब वासुदेवके समीपसे भृत्योंनें लेकर फेंक दिया ।। ६८ ।। हे राजन् ! हरिकी कीर्तिके बिना ब्राह्मणको गानयोग न करना चाहिये, यह पाप तुमने किया है ।। ६९ ।। तुम्हारे स्वर्ग-लोकादि इसी कर्मसे नष्ट होगये, तुम पर्वतकी कोटरमें जाकर अपनी देहकोही नोच नोचके प्रतिदिन भक्षण करो. ।। ७० ।।

तस्मिन्क्षीणे त्विमं देहं खाद नित्यं क्षुधान्वितः ।। महानिरय-
यसंस्थस्त्वं यावन्मन्वंतरं भवेत् ।। ७१ ।। मन्वंतरे ततोऽतीते भूम्यां
त्वं श्वा भविष्यसि ।। ततः कालेन कियता मानुष्यमनुलप्स्यसे ।। ७२ ।।

क्षुधासे व्याकुल होकर तू नित्य इसी देहको भक्षण कर, इस प्रकार एक मन्वन्तर-तक महानरकमें निवास कर ।। ७१ ।। मन्वंतर बीतनेसे भूमिमें तू कुत्ता होगा, फिर बहुत कालके उपरान्त मनुष्यशरीरको प्राप्त होगा ।। ७२ ।।

एमुक्त्वा यमो विद्वांस्तत्रैवान्तरधीयत ।। सोऽहं नारद भूपालः
पुरेदानीमुलूकताम् ।। ७३ ।। लब्धवान्कर्मदोषेण हरिमित्रकृतेन वै ।।
ततो मानसशैलेऽहं कोटरे ह्यवसं मुने ।। ७४ ।।

यह कह यमराज वहीं अन्तर्धान होगये हे नारद ! सो वह राजा मैं उलूकताको प्राप्त हुआ हूं ।। ७३ ।। हरिमित्रके साथ क्षुद्रता करनेसे यह दोष मुझको प्राप्त हुआ है हे मुने ! तब मैं इस मानसकी कोटरामें निवास करने लगा ।। ७४ ।।

पूर्वो मृतकदेहो मे भक्षणाय ह्युपस्थितः ।। क्षुधान्वितोऽतंदेहं
खादितुं ह्युपचक्रमे ।।७५।। तत्क्षणं दैवयोगेन हरिमित्रो महायशाः ।।
विमानेनार्कवर्णेन स्तूयमानोऽप्सरोगणैः ७६ ।।

और पूर्व मृतक शरीर मेरे भक्षणके निमित उपस्थित हुआ, मैं क्षुधायुक्त हो उस देहके खानेकी इच्छा करने लगा उसी क्षण दैवयोगसे महायशस्वी हरिमित्र सूर्यके समान प्रकाशमान विमानपर स्थिर अप्सराओंसे स्तुतिको प्राप्त हो ।। ७५ ।। ७६ ।।