अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)
Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)
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Read in context(११०) अद्भुतरामायण [विशंति-
नीलजीमूतसंकाशैः समुद्यतशिलायुधैः ।। दीप्तानलरवि-
प्रख्यैर्नेत्रैस्तैः सर्वतो वृतम् ।। १७ ।। तद्वीक्ष्य राक्षसबलं संरब्धाश्च
प्लवंगमाः ।। क्रुद्धं तद्राक्षसं सैन्यं जघ्नुर्द्रुमशिलायुधैः ।। १८ ।।
नीलमेघके समान शिला आयुध उठाये दीप्त अग्नि और सूर्यके समान सब दिशा राक्षसोंसे भर गई ।। १७ ।। उस राक्षसी सेनाको देखकर संरम्भको प्राप्त होकर क्रोध कर उस राक्षसी सेनाको द्रुम शिला आयुधोंसे मारने लगे ।। १८ ।।
ते पादशिलाशैलेस्तां चक्रुर्वृष्टिमुत्तमाम् ।। वृक्षौघैर्वज्रसंका-
शैर्हरयो भीमविक्रमाः ।। १९ ।। शिखरैः शिखराभांस्ते यातुधानानमर्द
यन् ।। निर्जघ्नुःसमरे क्रुद्धा हरयो राक्षसर्वभान् ।। २० ।।
वे वृक्ष शिला शैलोंकी वर्षा करने लगे और भयंकर पराक्रमी वानर वृक्षोंसे युद्ध करने लगे ।। १९ ।। और शिखरोंसे शिखरोंके समान राक्षसोंको ताडन करने लगे, इसप्रकार क्रोध कर दैत्योंको तांडन करने लगे ।। २० ।।
केचिद्रथगतान्वीरान्गजवाजिस्थितौनपि ।। निर्जघ्नुः सहसाप्लुत्य
यातुधानानप्लवंगमाः ।। २१ ।। शैलशृंगनिभास्ते तु ✤ मुष्टिनिष्क्रांत
लोचनाः ।। ✤वेपु पेतुश्च नेदुश्च ततो राक्षसपुंगवाः ।। २२ ।।
कोई रथमें प्राप्त वीर हाथी घोडोंपर स्थित थे उन राक्षसोंको कूद कूद कर वानर मारने लगे ।। २१ ।। ये पर्वतके श्रृंगके समान अपने घूसोंसेही उनके नेत्र निकाल डालते थे, तब वे राक्षस कंपित होकर गिर पडते थे ।। २२ ।।
ततः शूलैश्च वज्रैश्च विमुष्टैर्हरिपुंगवैः ।। मुहूर्तेनावृता भूमि-
रभवच्छोणितप्लुता ।। २३ ।। विकीर्णैः पर्वताग्रैश्च रक्षोभिरुपम-
र्द्दितैः ।। आक्षिप्ताः क्षिप्यमाणाश्च भग्नशेषाश्च वानराः ।। २४ ।।
फिर शूल वज्र और मुष्टियोंसे वानरों द्वारा व भूमि रुधिरसे व्याप्त होगई ।। २३ ।। पर्वताग्रोंसे विकीर्ण हुई राक्षसोंसे मर्दित हुई आक्षिप्त और क्षिप्यमान होकर सब वानर भग्न हो गये ।। २४ ।।
रथेन रथिनं चापि राक्षसं राक्षसेन च ।। हयेन च हयं केचित्पि-
पेषुर्धरणी तले ।। २५ ।। वानरान्वानरैरेव जघ्नुर्घोरा हि राक्षसाः ।।
राक्षसान्राक्षसैरेव पिपिषुर्वानरा युधि ।। २६ ।।
* मुष्टिप्रहारेण निष्क्रांतलोचनाः । * आर्षम् ।