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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 268, कुल 572 में से

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पृष्ठ 268

२६० ] योगकुण्डल्युपनिषत्
आधिभौतिकदेहं तु अधिदैविकविग्रहे ।
देहोऽतिविमलं याति चातिवाहिकतामियात् ॥७७
जाड्यभावविनिर्मुक्तममलं चिन्मयात्मकम् ।
तस्यातिवाहिकं मुख्यं सर्वेषां तु मदात्मकम् ॥७८
जायाभवविनिर्मुक्तिः कालरूपस्य विभ्रमः ।
इति तं स्वस्वरूपा हि मती रज्जुभुजङ्गवत् ॥७९
मृषैवोदेति सकलं मृषैव प्रविलीयते ।
रौप्यबुद्धिः शुक्तिकायां स्त्रीपुंसोर्भ्रंमतो यथा ॥८०
भौतिक देह चाहे छोटा हो या बड़ा हो जब उष्णता बहुत बढ़ती
है तो वह समस्त देह में उसी प्रकार फैल जाती है जैसे गर्मी पाकर सुवर्ण
फैल जाता है ॥ ७६ ॥ इसके प्रभाव से आधिभौतिक देह आधिदैविक
हो जाता है और शरीर अत्यन्त विमल होकर सूक्ष्म शरीर की तरह हो
जाता है ॥ ७७ ॥ वह जड़ता को त्याग कर निर्मल चित्स्वरूप हो
जाता है, जब कि अन्य देह जड़तायुक्त ही बने रहते हैं ॥ ७८ ॥
ऐसे साधक का गर्भवास छूट जाता है और काल का भी उस पर वश
नहीं चलता । उसको अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान हो जाता है । जिस
प्रकार रस्सी में सांप का भ्रम होता है, सीपी में चाँदी का भ्रम होता है,
स्त्री में पुरुष का भ्रम होता है, इसी प्रकार वह अपने देह सम्बन्धी भ्रम
को समझ जाता है कि यह मिथ्या है ॥ ७९-८० ॥
पिण्डब्रह्माण्डयोरैक्यं लिङ्गसूत्रात्मनोरपि ।
स्वापाव्याकृतयोरैक्यं स्वप्रकाशचिदात्मनोः ॥८१
शक्तिः कुण्डलिनी नाम बिसतन्तुनिभा शुभा ।
मूलकन्दं फणाग्रेण दृष्ट्वा कमलकन्दवत् ॥८२
मुखेन पुच्छं संगृह्य ब्रह्मरन्ध्रसमन्विता ।
पद्मासनगतः स्वस्थो गुदमाकुञ्च्य साधकः ॥८३