१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 79, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ४ मन्त्र १ ७९
मेघ ही सविता है और वर्षण सावित्री है। जहाँ पर मेघ है, वहाँ वर्षण है; जहाँ वर्षण है, वहाँ मेघ
है। ये दोनों (मेघ और वर्षण) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ८ ॥
विद्युदेव सविता स्तनयित्नुः सावित्री यत्र ह्येव विद्युत् तत् स्तनयित्नुः यत्र वै
स्तनयित्नुस्तद्विद्युदित्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ९ ॥
विद्युत् ही सविता है और उसकी तड़क सावित्री है। जहाँ पर विद्युत् है, वहाँ तड़क है जहाँ पर
तड़क है, वहाँ विद्युत् है। ये दोनों (विद्युत् और तड़क) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ९ ॥
प्राण एव सविता अन्नं सावित्री, यत्र ह्येव प्राणस्तदन्नं यत्र वा अन्नं तत् प्राण इत्येते
द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ १० ॥
प्राण सविता है और अन्न सावित्री है। जहाँ पर प्राण है, वहाँ अन्न है; जहाँ अन्न है, वहाँ प्राण है। ये
दोनों (प्राण और अन्न) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ १०॥
वेदा एव सविता छन्दांसि सावित्री, यत्र ह्येव वेदास्तच्छन्दांसि यत्र वै छन्दांसि तद्
वेदा इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ११॥
वेद ही सविता है और छन्द सावित्री है। जहाँ वेद हैं, वहाँ छन्द हैं, जहाँ छन्द हैं, वहाँ वेद हैं। दोनों
(वेद और छन्द) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ११॥
यज्ञ एव सविता दक्षिणा सावित्री, यत्र ह्येव यज्ञस्तत् दक्षिणा यत्र वै दक्षिणास्तद्यज्ञ
इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ १२ ॥
यज्ञ ही सविता है और दक्षिणा सावित्री। जहाँ यज्ञ है, वहाँ दक्षिणा है और जहाँ दक्षिणा है, वहाँ यज्ञ
है। ये दोनों (यज्ञ और दक्षिणा) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ १२ ॥
एतद्ध स्मैतद्विद्वांसमोपाकारिमासस्तुर्ब्रह्मचारी ते संस्थित इत्यथैत आसस्तुराचित
इव चितो बभूवाथोत्थाय प्राव्राजीदित्येतद्वाऽहं वेद नैतासु योनिश्वित एतेभ्यो वा मिथुनेभ्यः
सम्भूतो ब्रह्मचारी मम पुरायुषः प्रेयादिति ॥ १३ ॥
(तदनन्तर ग्लाव मैत्रेय ने मौद्गल्य से कहा) हे विद्वान् आचार्य ! आपके द्वारा मैं उपकृत हुआ हूँ।
यह ब्रह्मचारी आपकी सेवा में (दक्षिणा हेतु) उपस्थित है। यह ब्रह्मचारी आपके यहाँ आकर ज्ञान से
परिपूर्ण हो गया है। ऐसा कहकर वे (मैत्रेय) वहाँ से उठकर टहलते हुए बोले- अब मैं यह जान गया हूँ,
इन जोड़ों तथा उत्पत्ति केन्द्रों से जुड़ा मेरा ब्रह्मचारी अल्पायु नहीं होगा॥ १३ ॥
॥ चतुर्थी कण्डिका ॥
ब्रह्म हेदं श्रियं प्रतिष्ठामायतनमैक्षत तत्तपस्व यदि तद् व्रते ध्रियेत तत्सत्ये प्रत्यतिष्ठत् ॥ १॥
मौद्गल्य ने मैत्रेय से कहा- यह ब्रह्म ही श्रीरूप, प्रतिष्ठा रूप और आश्रयरूप है, इसलिए आप तप
करें। यदि तपः-व्रत को धारण किया जाए, तो सत्य में प्रतिष्ठा होती है॥ १॥