१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 78, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ें७८ गायत्र्युपनिषद्
॥ तृतीया कण्डिका ॥
मन एव सविता, वाक् सावित्री, यत्र ह्येव मनस्तद् वाक्, यत्र वै वाक् तन्मन इत्येते
द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ १ ॥
मौद्गल्य ऋषि ने कहा- मन ही सविता (प्रेरक तत्त्व) और वाणी सावित्री (प्रेरित तत्त्व) है। जहाँ
पर मन है, वहाँ वाणी है, जहाँ वाणी है; वहाँ मन है। ये दो एक युग्म हैं, योनि (उत्पादक केन्द्र) रूप हैं॥
अग्नेिरेव सविता, पृथिवी सावित्री यत्र ह्येवाग्निस्तत्पृथिवी यत्र वे पृथिवी तदग्निरित्येते
द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ २ ॥
अग्नि ही सविता है और पृथ्वी सावित्री है। जहाँ पर अग्नि है, वहाँ पृथ्वी है, जहाँ पृथ्वी है; वहाँ
अग्नि है। ये दो (अग्नि और पृथ्वी) एक जोड़ा हैं, योनिरूप हैं॥ २ ॥
वायुरेव सविताऽन्तरिक्षं सावित्री यत्र ह्येव वायुस्तदन्तरिक्षं, यत्र वा अन्तरिक्षं
तद्वायुरित्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ३ ॥
वायु ही सविता है और अन्तरिक्ष सावित्री है। जहाँ पर वायु है, वहाँ अन्तरिक्ष है; जहाँ अन्तरिक्ष है,
वहाँ वायु है। ये दो (वायु और अन्तरिक्ष) एक युग्म और उत्पादक केन्द्र हैं॥ ३ ॥
आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री यत्र ह्येवादित्यस्तद्द्यौर्यत्र वै द्यौस्तदादित्य
इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ४ ॥
आदित्य ही सविता है और द्युलोक सावित्री है। जहाँ पर आदित्य है, वहाँ द्यौ है; जहाँ द्यौ है, वहाँ
आदित्य है। ये दोनों (द्यौ और आदित्य) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ४ ॥
चन्द्रमा एव सविता, नक्षत्राणि सावित्री, यत्र ह्येव चन्द्रमास्तन्नक्षत्राणि यत्र वै
नक्षत्राणि तच्चन्द्रमा, इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ५ ॥
चन्द्रमा ही सविता है और नक्षत्र सावित्री है। जहाँ चन्द्रमा है, वहाँ नक्षत्र है तथा जहाँ नक्षत्र है, वहाँ
चन्द्रमा है। ये दोनों (चन्द्रमा और नक्षत्र) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ५ ॥
अहुरेव सविता, रात्रिः सावित्री, यत्र ह्येवाहस्तद्रानिर्यत्र वै रात्रिस्तदहरित्येते द्वे
योनी एकं मिथुनम् ॥ ६ ॥
दिन ही सविता है और रात्रि सावित्री है। जहाँ पर दिन है, वहाँ रात्रि है; जहाँ रात्रि है, वहाँ दिन है।
ये दो (दिन और रात्रि) उत्पत्ति केन्द्र हैं, एक जोड़ा हैं॥ ६ ॥
उष्णामेव सविता, शीतं सावित्री, यत्र ह्येवोष्णं, तच्छीतं, यत्र वै शीतं तदुष्णमित्येते
द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ७ ॥
उष्णता ही सविता है और शीत सावित्री है। जहाँ उष्णता है, वहाँ शीत है; जहाँ शीत है, वहा
उष्णता है। ये दोनों (उष्णता और शीत) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ७ ॥
अब्भ्रमेव सविता वर्ष सावित्री यत्र ह्येवाब्भ्रन्तद्वर्षं यत्र वै वर्षं तदब्भ्रमित्येते द्वे योनी
एकं मिथुनम् ॥ ८ ॥