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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 505 में से

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पृष्ठ 74

७४ केनोपनिषद्
तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान्देवान्यदग्निर्वायुरिन्द्रस्तेन ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते
ह्येनत्प्रथमो विदांचकार ब्रह्मेति ॥ २ ॥
ये तीनों देव-अग्नि, वायु और इन्द्रदेव अन्य देवों की अपेक्षा श्रेष्ठ माने जाते हैं; क्योंकि ब्रह्म को शक्ति
के रूप में इन्हीं देवों ने सर्वप्रथम समझा और ब्रह्म का निकट से साक्षात्कार किया ॥ २ ॥
तस्माद्वा इन्द्रोऽ तितरामिवान्यान्देवान्स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श स ह्येनत्प्रथमो विदांचकार ब्रह्मेति ॥
निकट से ब्रह्म का स्पर्श करने से, सबसे पहले जान लेने से इन्द्रादि देवगण अन्य देवों की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं ॥ ३ ॥
तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतो व्यद्युतदा ३ इतीन्त्यमीमिषदा ३ इत्यधिदैवतम् ॥ ४ ॥
(इन्द्रदेव के सम्मुख यक्ष का अन्तर्धान हो जाना) ब्रह्म की उपस्थिति का संकेत बिजली के चमकने
और पलक के झपकने जैसा होता है । इसे उसका सूक्ष्म आधिदैविक संकेत समझना चाहिए ॥ ४ ॥
अथाध्यात्मं यदेतद्गच्छतीव च मनोऽ नेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णᳵ संकल्पः ॥ ५ ॥
आध्यात्मिक दृष्टि से यह समझना चाहिए कि मन जो ब्रह्म के पास जाता हुआ सा प्रतीत होता है और ब्रह्म
का स्मरण करता हुआ सा लगता है तथा ब्रह्म प्राप्ति का संकल्प करता हुआ सा भासित होता है । (यह भी ब्रह्म की
उपस्थिति का सूक्ष्म संकेत है ) ॥ ५ ॥
तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाऽ भि हैनᳵ सर्वाणि भूतानि
संवाञ्छन्ति ॥ ६ ॥
समस्त प्राणी उस ब्रह्म से प्रेम करते हैं और उसे पाना चाहते हैं, वह तद्वन नाम से प्रसिद्ध है । ब्रह्म के
इसी 'तद्वन' स्वरूप की सभी को उपासना करनी चाहिए। जो साधक ब्रह्म के इस स्वरूप को जान लेता
है, उसे सब प्राणी अपना प्रिय मानने लगते हैं ॥ ६ ॥
[ ऋषि ने ब्रह्म को 'तद्वन' कहा है । आचार्य शंकर ने इसका अर्थ तद्-भजनीयम् (वह ध्यान करने योग्य है)
किया है । 'वन'- रस के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है, इस आधार पर ब्रह्म मूल रूप से 'रस स्वरूप' है - ऐसा बोध
होता है। ऋषि का मानना है कि जिस साधक की गति आत्म तत्त्व में हो जाती है, उसकी आत्मीयता का विस्तार
इतना हो जाता है कि उसके प्रभाव में सभी प्राणी आ जाते हैं।]
उपनिषदं भो ब्रूहीत्युक्ता य उपनिषद्ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥ ७ ॥
(ब्रह्म विद्या के इस सांकेतिक उपदेश को न समझ पाने के कारण पुनः शिष्य कहता है) हे गुरुदेव !
हमें ब्रह्मविद्या स्वरूप उपनिषद् का उपदेश दें। तब उन्होंने कहा कि अभी तक जो कुछ भी कहा गया है,
वही ब्रह्मविद्या है, तुम्हें निश्चय ही मैंने ब्रह्मविद्या सिखा दी है ॥ ७ ॥
तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् ॥ ८ ॥
तपस्या, मन एवं इन्द्रियों का नियन्त्रण तथा आसक्ति रहित श्रेष्ठ कर्म-ये ही ब्रह्मविद्या प्राप्ति के आधार
हैं। वेद में इस विद्या का सविस्तार वर्णन है। सत्यस्वरूप ब्रह्म ही इस विद्या का प्राप्य-लक्ष्य है ॥ ८ ॥
यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्टति प्रतितिष्ठति ॥ ९ ॥
इस ब्रह्मविद्या के रहस्य को भली-भाँति जानने वाला साधक अपने समस्त पापसमूह को विनष्ट कर
अविनाशी, असीम एवं सर्वश्रेष्ठ स्थिति में पहुँच जाता है - परमधाम को प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥
॥ इति केनोपनिषत्समाप्ता ॥