१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ कठोपानिषद्
य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः। तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म
तदेवामृतमुच्यते। तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन, एतद्वै तत्॥ ८॥
समस्त जीवों के कर्मानुसार उनके निमित्त भोगों का निर्माण और व्यवस्था करने वाला परम पुरुष
परमात्मा सबके सो जाने पर भी जाग्रत् रहता है। वही विशुद्ध तत्त्व, परब्रह्म अविनाशी कहलाता है, जिसे
कोई लाँघ नहीं सकता और समस्त लोक जिसका आश्रय ग्रहण किये रहते हैं। वही यह ब्रह्म है॥ ८॥
अब यम यह समझाते हैं कि परमात्मा की तरह अग्नि आदि तत्त्व भी अलिप्त रहकर ही विश्वरूप बन पाते हैं-
अग्निर्ग्रथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९ ॥
जिस प्रकार एक ही अग्नि तत्त्व सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट होकर प्रत्येक आधारभूत वस्तु के अनुरूप
हो जाता है, उसी प्रकार समस्त प्राणियों में स्थित अन्तरात्मा (ब्रह्म) एक होने पर भी अनेक रूपों में
प्रतिभासित होता है। वही उनके बाहर भी है ॥९॥
वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १०॥
जिस प्रकार इस लोक में प्रविष्ट वायु एक होता हुआ भी प्रत्येक रूप के अनुसार (अर्थात् विभिन्न
वस्तुओं के संयोग से) भिन्न-भिन्न शक्तियुक्त प्रतीत होता है, उसी प्रकार समस्त प्राणियों में विद्यमान
परमात्मा एक होने पर भी विभिन्न रूप वाला प्रतीत होता है। वही उनके बाहर भी है॥ १०॥
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११ ॥
जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड का चक्षुरूप सूर्य प्राणियों के चक्षुओं से उत्पन्न होने वाले बाह्य दोषों से
लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सब भूतों (प्राणियों) में आत्मारूप से स्थित परमेश्वर-उन जीवों के दुःख -
क्लेश आदि से लिप्त नहीं होता। सब भूतों के अन्तर में रहकर भी वह बाहर ही विराजमान है॥ ११ ॥
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२॥
समस्त शरीरधारियों में (अन्तरात्मा के रूप में) निवास करने वाला तथा सबको वश में रखने वाला
परब्रह्म एक होते हुए भी अनेक रूप धारण कर लेता है। जो विद्वान् सदैव अपने अन्तःस्थल में स्थित उस
परब्रह्म के दर्शन करते हैं, उन्हें ही शाश्वत सुख प्राप्त होता है, अन्यों को नहीं ॥ १२॥
नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १३ ॥
जो समस्त चैतन्यों में चैतन्य और नित्यों में भी नित्य है, जो एकाकी होते हुए समस्त जीवों के
कर्मानुसार उनका फल प्रदाता है, उस आत्मस्थ परमेश्वर का बुद्धिमान् जन निरन्तर दर्शन करते रहते हैं।
ऐसे मेधावी पुरुष ही शाश्वत शान्ति प्राप्त करते हैं, दूसरे नहीं ॥१३॥
तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् ।
कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥ १४॥