Skip to content
SarvaKosh
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 474 of 505

Read in context
Page 474

४८० {परिशिष्ट} सङ्कल्प

और अधिक खाने वाला महापापी कहा है, ये रजोगुण से उत्पन्न होने वाले हैं-काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् (गी०३.३७)। काम का आशय कामना या इच्छा है। रजोगुण से उत्पन्न
विषय-वासना और तृष्णा ही काम है। गीता के अनुसार विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्यों की उसमें आसक्ति
हो जाती है, आसक्ति से काम, काम से क्रोध और क्रोध से मोह उत्पन्न होता है। काम, क्रोध, लोभ ये तीनों आत्मा
का नाश करने वाले हैं, अतः इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए-त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः
क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् (गी०१६.२१)। जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर निःस्पृह, निर्मम
और निरहंकार (लोभ, मोह, मद रहित) होकर विचरता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है-विहाय कामान्यः
सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति (गी०२.७१)। अहंकार, अज्ञान, उन्माद
आदि के पर्याय रूप में 'मद' शब्द प्रयुक्त होता है। मत्सर का आशय किसी के वैभव-विलास को देखकर जलन
या डाह करना है। कृष्णोपनिषद् में द्वेष और मत्सर की संगति राक्षसों से बिठायी गयी है- द्वेषश्चाणूरमल्लोऽयं
मत्सरो मुष्टिको जयः (कृष्णो०१४)।
२२३. षोडशकला — चन्द्रमा के सोलह भाग जो एक-एक क्रम से शुक्ल पक्ष में बढ़ते और कृष्ण पक्ष में क्षीण होते
हैं। मनुष्य के सोलह विशिष्ट गुणों या शक्तियों को भी षोडशकला कहते हैं। इस तथ्य की पुष्टि ब्राह्मण ग्रन्थों से
होती है- षोडशकलो वै चन्द्रमाः (ष०ब्रा० ४.६), षोडशकलो वै पुरुषः (शत०ब्रा० ११.१.६.३६)। उस पूर्ण
ब्रह्म को भी षोडशकला कहकर वर्णित किया गया है- षोडशकलं वै ब्रह्म (जै०उ०३.३८
.८)। इस सम्पूर्ण जगत् को भी षोडशकलाओं से युक्त माना गया है- षोडशकलं वा इदं सर्वम् (शत०ब्रा०
१३.२.२.१३)। यहाँ षोडश संख्या पूर्णता का बोधक है और षोडश कला पूर्ण शक्तियों से भरी रचना। कला शब्द
का अर्थ शास्त्रों में इस प्रकार भी दिया गया है- कं ब्रह्म लीयते आच्छाद्यते यया, सा कला। अर्थात् जिसके द्वारा
क (ब्रह्म) लीन-आच्छादित होता है, उसे कला कहते हैं। ब्रह्म की सोलह कलाएँ निम्न हैं- प्राण, श्रद्धा, आकाश,
वायु, तेज, जल, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक और नाम। वस्तुतः परात्पर ब्रह्म की ६४
कलाएँ मानी जाती हैं। चूँकि ब्रह्म के ३ चरण ऊर्ध्व में विद्यमान हैं और एक चरण ही इस विश्व ब्रह्माण्ड के रूप में
है। इसका संकेत पुरुष सूक्त में प्राप्त है- त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाऽभवत्पुनः (यजु० ३१.२), इसलिए
६४ का चतुर्थांश १६ ही हुआ।
२२४. संवत्सर — संवत्सर शब्द प्रायः वर्ष या साल के लिए प्रयुक्त होता है। प्रत्येक साठ वर्षों को ५-५ वर्ष के १२ युगों
में विभक्त किया गया है। प्रत्येक युग का प्रथम वर्ष संवत्सर कहलाता है। ये संवत्सर साठ माने गये हैं। संवत्सर
का आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। जिस दिन मत्स्यावतार हुआ और सृष्टि का पुनः आरम्भ हुआ, उसी दिन
से संवत्सर का आरंभ माना जाता है। आदित्य को संवत् और चन्द्रमा को सर कहकर निरूपित किया गया है-
आदित्य एव संवच्चन्द्रमाः सरः (जै० ब्रा० २.६०)। एक संवत्सर में बारह मास या चौबीस अर्धमास होते हैं-
द्वादश मासाः संवत्सरः (मैत्रा०ब्रा० १.१०.५) चतुर्विंशत्यर्धमासो वै संवत्सरः (ऐत० ब्रा० ८.४)। अग्नि तथा
प्रजापति को भी संवत्सर से सम्बद्ध किया गया है- अग्निः संवत्सरः (तां०म० १७.१३.१७)। स वै संवत्सर एव
प्रजापतिः (शत०ब्रा० १.६.३.३५)!
२२५. संस्कार — संस्कार का आशय है-सुधार, परिष्कार अथवा मनोवृत्ति या स्वभाव का परिशोधन। शिक्षा, उपदेश या
संगति से मनुष्य के अचेतन मन पर एक गहरा प्रभाव पड़ता है, जिसके प्रभाव में उसके क्रियाकलाप सहज ही प्रेरित
होते हैं, संस्कार कहलाता है। ऋषियों ने जन्म से पूर्व तथा मृत्युपर्यन्त तक के जीवन क्रम में यज्ञीय कर्मकाण्ड परक
षोडश संस्कारों की परम्परा प्रचलित की, जिससे मनुष्य का विचारात्मक तथा भावनात्मक परिशोधन होते रहने का
क्रम जीवन भर सम्पादित होता रहे। संस्कार योग्यता वृद्धि की विशिष्ट प्रक्रिया है, जिसके सम्पन्न होने से व्यक्ति या
पदार्थ किसी विशेष प्रयोजन के योग्य बन जाते हैं-संस्कारो नाम स भवति यस्मिन् जाते पदार्थो भवति योग्यः
कस्यचिदर्थस्य (जैमि०सूत्र० ३.१.३ शबर भाष्य), योग्यतां चादधानाः क्रियाः संस्कारा इत्युच्यन्ते (तंत्रवार्तिक)।
२२६. सङ्कल्प — सङ्कल्प शब्द सामान्यतः दृढ़ निश्चय, पक्का इरादा या विचार, तीव्र इच्छा अथवा उद्देश्य के अर्थ में
लिया जाता है। हमारा मन ही सभी संकल्पों का अयन (आश्रय) है-सर्वेषां संकल्पानां मन एकायनम्