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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 473 of 505

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Page 473

श्राद्ध [ परिशिष्ट ] ४७९

वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम् (रा०मा० बालकाण्ड श्लोक
२)। गीता में भगवान् ने कहा है कि सबकी श्रद्धा अपने अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय ही है।
जो जैसी श्रद्धा वाला होता है, वह वैसा ही होता है- सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं
पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः (गी०१७.३)। जो-जो भक्त जिस-जिस स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है,
भगवान् उस-उस भक्त की उस रूप के प्रति श्रद्धा को स्थिर करता है- यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् (गी०७.२१)। देवगण भी श्रद्धा की उपासना करते हैं, श्रद्धा से परम
ऐश्वर्य मिलता है-श्रद्धां देवा यजमाना वायुगोपा उपासते। श्रद्धां.... श्रद्धया विन्दते वसु (ऋ०१०.१५१.४)।
२१९.श्राद्ध— पितरों की तृष्टि तथा शान्ति के लिए श्रद्धापूर्वक अन्न, जल, भोग पदार्थों आदि का दान करना श्राद्ध कहलाता
है। शास्त्र विहित पितृ कर्म या लोकविधि के अनुसार पितरों के क्रिया कर्म को भी श्राद्ध कहते हैं। दूसरे शब्दों में-
पितरों की तृप्ति के लिए शास्त्रविधि से श्रद्धापूर्वक किया गया धार्मिक कृत्य श्राद्ध कहलाता है। मनु के अनुसार श्राद्ध
पाँच प्रकार का है-नित्यं नैमित्तिकं काम्यं वृद्धिश्राद्धं तथैव च। पार्वणञ्चेति मनुना श्राद्धं पञ्चविधं स्मृतम्॥
भविष्य पुराण में बारह प्रकार के श्राद्ध वर्णित हैं। श्राद्ध प्रक्रिया प्रारम्भ करने का श्रेय इक्ष्वाकुपुत्र निमि को दिया जाता
है। इन्होंने अपने पुत्र श्रीमत की असामयिक मृत्यु के एक वर्ष बाद श्राद्ध किया था। आश्विन कृष्णपक्ष में पितरों के
निमित्त विशेष रूप से तर्पण, पिण्डदान आदि किया जाता है, यह श्राद्धकाल या श्राद्धपक्ष कहलाता है।
२२०. श्रेय-प्रेय मार्ग— श्रेय और प्रेय मार्ग की चर्चा अध्यात्म शास्त्र में प्रायः होती रहती है, परन्तु कठोपनिषद् में
इसका विशेष रूप से वर्णन पाया जाता है। यम-नचिकेता के प्रसिद्ध संवाद में जब यमराज से 'आत्मविद्या' के
तृतीयवर की याचना नचिकेता ने की, तो यमराज ने उसे दीर्घ आयु, स्वर्गिक आनन्द, हाथी, घोड़ा, रथ तथा अन्यान्य
वैभव व एक छत्र राज्य माँग लेने को कहा तथा 'आत्मविद्या' का वर माँगने का हठ न करने को कहा, परन्तु
नचिकेता की दृढ़ प्रतिज्ञ स्थिति और उसके अधिकारी स्वरूप की परीक्षा कर लेने के बाद यमराज स्वयमेव उन दोनों
मार्गों को स्पष्ट करते हैं। प्रथम श्रेय मार्ग, जो आनन्द स्वरूप परब्रह्म की प्राप्ति का साधन है तथा दूसरा प्रेय मार्ग,
जो इस लोक एवं स्वर्गलोक के सुख-भोग की सामग्रियों की प्राप्ति का साधन है। यमराज इसी प्रकरण में यह भी
कहते हैं कि धीर पुरुष प्रेय की अपेक्षा श्रेय मार्ग का ही वरण करते हैं, जबकि मन्दबुद्धि व्यक्ति सांसारिक सुखों वाले
प्रेय मार्ग का वरण करते हैं-श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः। श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो
वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते (कठ०१.२.२)। इसी तथ्य को गीता (१८.३७-३८) में सात्त्विक एवं
राजस सुख के रूप में प्रतिपादित किया गया है। प्रारम्भ में दुःखद एवं बाद में अमृतोपम लगने वाले सुख को
सात्त्विक तथा प्रारम्भ में सुखद एवं परिणाम में दुःखद लगने वाले सुख को राजस कहा गया है। यही स्थिति श्रेय
और प्रेय की है। श्रेय मार्ग प्रारम्भ में सुखद नहीं लगता, परन्तु परिणाम में कल्याणकारी होता है, जबकि प्रेय मार्ग
प्रारम्भ में बड़ा ही आकर्षक-आनन्ददायी लगता है, परिणाम में भले ही दुःखदायी हो।
२२१. श्रोत्रिय— जो वेद-वेदाङ्गों में पारंगत हो, वह वेदज्ञ-वेदविद् श्रोत्रिय कहलाता है। इसका अन्य पर्याय सभ्य,
सुसंस्कृत, ब्राह्मण विशेष है। वेद का एक पर्याय श्रुति है, अतः श्रुति (ज्ञान) से सुसम्पन्न पुरुष को श्रोत्रिय कहा जाता
था। उपनिषद् में वर्णन है कि अन्न के प्राण को जानने वाले श्रोत्रिय भोजन करने से पूर्व आचमन करते हैं तथा
भोजनोपरान्त आचमन करते हैं- तद्विद्वांसः श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वाचामन्ति (बृह०६.१.१४)।
काल सम्पूर्ण प्राणियों और महात्माओं को भी समाहित कर लेता है और जो काल को भी नियंत्रण में करना जानता
है, वह वेदविद् (श्रोत्रिय) है- कालः पचति भूतानि सर्वाण्येव महात्मनि। यस्मिंस्तु पच्यते कालो यस्तं वेद स
वेदवित् (मैत्रा०६.१५)। जो देवों के सौ आनन्द हैं, वह इन्द्रदेव का एक आनन्द है और ऐसा श्रोत्रिय जो इन्द्र के
(वैभव के) भोगों की कामना से रहित है, उसे वह सहज प्राप्त है-ते ये शतं देवानामानन्दाः। स एक इन्द्रस्यानन्दः।
श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य (तैत्ति०२.८)।
२२२. षड्रिपु-षड्वर्ग— काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर इन्हें षड्रिपु कहा गया है। इन्हें मुद्गलोपनिषद्
में षड्वर्ग भी कहा गया है-कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यमित्यरिखड्गवर्गः (मुद्ग०४.४)। इस उपनिषद् का नित्य
अध्ययन करने वाला काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों से अबाधित रहता है। गीता में भगवान् ने भी इन्हें वैरी